अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जहां एक ओर कई देशों पर टैरिफ लगाकर वहां के व्यापार को प्रभावित करने में जुटे हुए हैं,वहीं दूसरी तरफ चीन ने भी इसके जवाब में अप्रैल माह में ही रक्षा, ऊर्जा और मोटर वाहन क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले सात दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (आरईई) और चुम्बकों पर निर्यात प्रतिबंध लगाकर दिखा दिया कि हम भी किसी से कम नहीं है। इसका सीधा-सीधा असर दुनिया भर के व्यापारियों पर पडऩे वाला है। भारत के वाहन निर्माताओं पर इसका प्रभाव पडऩा शुरू हो गया है, जिसमें भारत के इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता भी शामिल हैं। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मैन्युफैक्चरिंग ने पिछले कुछ महीनों में तेजी पकड़ी ही थी कि चीन ने चीन ने ईवी समेत कई अन्य उपकरणों में लगने वाली इलेक्ट्रिक सर्किट के लिए जरूरी दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों का निर्यात रोक दिया है। प्रतिबंध में कहा गया है कि चीन सरकार की अनुमति के बिना किसी भी विदेशी ग्राहक को रेयर अर्थ मैग्नेट्स की बिक्री नहीं की जाए। पिछले कुछ महीनों से भारत जहां इलेक्ट्रिक वाहन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूती से कदम बढ़ा रहा था, लेकिन चीन की तरफ से खड़ी की गई बाधा नई चिंता का विषय बन गई है। वैसे अब भारत सरकार भी इस ओर सचेत होकर इसकी योजना बनाने में जुट गई है। वैसे दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के खजाने के लिहाज से भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। पर इसके उत्पादन में भारत की स्थिति बहुत दयनीय है। अभी सिर्फ एक सरकारी कंपनियां ही दुर्लभ तत्वों का खनन करती है। उसका उत्पादन भी परमाणु ऊर्जा और रक्षा इकाइयों की जरूरतें पूरा करने तक सीमित है। अन्य क्षेत्रों के लिए जरूरी दुर्लभ तत्वों का आयात चीन से किया जाता है। अब भारत सरकार भी निजी कंपनियों को भी उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने का मानस बना चुकी है। दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के खनन और उसकी प्रोसेसिंग के काम में लगाने के लिए हर तरह से मदद करने को तैयार है। इसके लिए जरूरी मशीनों की विदेशों से आयात को ड्यूटी फ्री करने और उत्पादन पर इंसेंटिव देने की योजना है। दुनिया के सामने समस्या यह है कि इन दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के उत्पादन पर चीन का एकाधिकार है। पर अब चीन का झटका मिलते ही भारत, चीन पर निर्भरता घटाने के लक्ष्य पर आगे बढ़ रहा है।

