Thursday, July 16, 2026 |
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आयुर्वेद केवल उपचार नहीं, स्वस्थ जीवन जीने की संपूर्ण विज्ञान प्रणाली है: डॉ. हर्षवर्धन सिंघल

by Business Remedies
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जयपुर | चारू भाटिया | जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों, तनावजनित विकारों और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि के साथ, अनेक लोग समग्र और निवारक स्वास्थ्य देखभाल समाधानों की तलाश में चिकित्सा की पारंपरिक प्रणालियों की ओर रुख कर रहे हैं। आयुर्वेद, जो दुनिया की सबसे प्राचीन उपचार विज्ञान प्रणालियों में से एक है, केवल लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय रोग के मूल कारण का उपचार करने पर अपने जोर के कारण लगातार लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इस आंदोलन के अग्रणी व्यक्तित्वों में से एक हैं Jaipur स्थित Vedayu Wellness Ayurveda Panchakarma Hospital के वैद्य एवं विशेषज्ञ Dr. Harshvardhan Singhal, जो प्रामाणिक पंचकर्म और व्यक्तिगत रोगी देखभाल की वकालत करते हैं। इस विस्तृत बातचीत में Dr. Singhal आयुर्वेद के सिद्धांतों, पंचकर्म के महत्व, पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े सामान्य मिथकों, आधुनिक शहरी जीवनशैली की चुनौतियों तथा भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में आयुर्वेद की बढ़ती भूमिका पर अपने विचार साझा करते हैं।

प्रश्न: आप Jaipur के Vedayu Wellness Ayurveda Panchakarma Hospital में कार्यरत हैं। यहां आप कौन-कौन सी आयुर्वेदिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं?

उत्तर: पंचकर्म आयुर्वेद की सबसे गहन और प्रामाणिक उपचार प्रणालियों में से एक है, फिर भी इसे अक्सर गलत समझा जाता है। बहुत से लोग गलती से पंचकर्म को केवल मालिश और विश्राम चिकित्सा से जोड़कर देखते हैं। वास्तविकता में यह एक अत्यंत सुव्यवस्थित शोधन और पुनर्यौवन प्रक्रिया है, जिसके लिए विशेष आधारभूत संरचना, प्रशिक्षित चिकित्सक और सावधानीपूर्वक तैयार किए गए उपचार प्रोटोकॉल की आवश्यकता होती है। प्रामाणिक पंचकर्म केवल भारत के चुनिंदा केंद्रों में किया जाता है, जिनमें पारंपरिक रूप से Kerala सबसे प्रसिद्ध केंद्रों में से एक रहा है। Jaipur में Vedayu Wellness Ayurveda Panchakarma Hospital उन चुनिंदा संस्थानों में शामिल है जो शास्त्रीय पंचकर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में अपनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

Vedayu में हम संतुलन बहाल करने और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न आयुर्वेदिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। इनमें विशेष रूप से निर्मित कक्षों में दी जाने वाली स्वेदन चिकित्सा (स्टीम थेरेपी) शामिल है, जो शरीर के स्रोतों को खोलने और विषहरण प्रक्रिया को समर्थन देने में सहायक होती है। पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से निर्धारित शोधन प्रक्रियाओं के माध्यम से शरीर में संचित विषैले तत्वों अथवा ‘आम’ को बाहर निकालना होता है। प्रारंभिक प्रक्रियाओं के दौरान उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण पदार्थों में औषधीय घृत भी शामिल है, जो शरीर की गहरी ऊतकों में जमा विषाक्त पदार्थों को ढीला करने में मदद करता है। रोगी की स्थिति और उपचार योजना के अनुसार, इन विषाक्त पदार्थों को बाद में वमन या विरेचन जैसी चिकित्सा प्रक्रियाओं के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। आयुर्वेद केवल लक्षणों को दबाने के बजाय बीमारी के मूल कारण का उपचार करता है। इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (आईबीएस), सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, कमर संबंधी विकारों और विभिन्न मांसपेशीय एवं अस्थि संबंधी रोगों का उपचार व्यक्तिगत उपचार प्रोटोकॉल के माध्यम से किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ सर्वाइकल रोगों में औषधीय तेलों का अत्यंत नियंत्रित तरीके से उपयोग किया जाता है। कई रोगी आक्रामक चिकित्सकीय हस्तक्षेपों से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपचार का सहारा लेते हैं और हमारा उद्देश्य उन्हें ऐसा समग्र उपचार प्रदान करना है जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ और कार्यक्षमता में सुधार पर केंद्रित हो।

प्रश्न: Vedayu अन्य आयुर्वेदिक केंद्रों से किस प्रकार अलग है?

उत्तर: Vedayu की सबसे बड़ी विशेषता इसका रोगी-केंद्रित और व्यक्तिगत दृष्टिकोण है। आयुर्वेद मानता है कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति विशिष्ट होती है और इसलिए कोई एक उपचार सभी पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। उपचार शुरू करने से पहले हम रोगी के चिकित्सा इतिहास, जीवनशैली, खानपान की आदतों और मूल स्वास्थ्य समस्याओं को समझने में पर्याप्त समय लगाते हैं। यह विस्तृत मूल्यांकन हमें प्रत्येक रोगी की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप उपचार योजनाएं तैयार करने में सक्षम बनाता है। हम प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित शास्त्रीय पंचकर्म प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करते हैं, जिससे निदान और उपचार दोनों में प्रामाणिकता सुनिश्चित होती है।

प्रश्न: पंचकर्म की सटीक प्रक्रिया क्या है?

उत्तर: पंचकर्म कोई एकल चिकित्सा नहीं है, बल्कि यह शोधन और पुनर्यौवन की एक व्यापक प्रणाली है। इसकी सटीक उपचार प्रक्रिया रोगी की प्रकृति, रोग की स्थिति, आयु, ऋतु तथा समग्र स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार भिन्न होती है। यह प्रक्रिया सामान्यत: प्रारंभिक उपचारों से शुरू होती है, जिनका उद्देश्य शरीर की गहरी ऊतकों में मौजूद विषाक्त पदार्थों को पाचन तंत्र की ओर लाना होता है। पर्याप्त तैयारी के बाद रोगी को एक या अधिक शोधन उपचार दिए जा सकते हैं, जिनमें चिकित्सीय वमन (वमन), विरेचन (विरेचन), औषधीय बस्ती (बस्ति), नस्य (नाक के माध्यम से शोधन प्रक्रिया) अथवा कुछ विशेष मामलों में रक्तशोधन तकनीकें शामिल हो सकती हैं। प्रत्येक प्रक्रिया विशेषज्ञ पर्यवेक्षण में और सावधानीपूर्वक मूल्यांकन के बाद ही की जाती है। पंचकर्म का उद्देश्य शारीरिक संतुलन को पुनर्स्थापित करना, चयापचय (मेटाबॉलिज्म) में सुधार करना, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना और शरीर की प्राकृतिक उपचार प्रणालियों को समर्थन देना है। आयुर्वेदिक चिकित्सकों के अनुसार, यह पाचन संबंधी विकारों, मांसपेशीय एवं अस्थि संबंधी समस्याओं, पुरानी कब्ज तथा कुछ जीवनशैली संबंधी रोगों सहित अनेक स्थितियों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

प्रश्न: शहरी जीवन ग्रामीण जीवन से किस प्रकार भिन्न है और कॉर्पोरेट कर्मचारियों को स्वस्थ रहने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: पारंपरिक ग्रामीण जीवनशैली में सामान्यत: अधिक शारीरिक गतिविधियां और ताजे तथा कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता शामिल होती है। अनेक ग्रामीण समुदाय आज भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध दूध, दही, सब्जियां और अनाज का सेवन करते हैं तथा नियमित शारीरिक श्रम करते हैं। ये सभी कारक स्वाभाविक रूप से चयापचय स्वास्थ्य और शारीरिक फिटनेस को समर्थन देते हैं। इसके विपरीत, शहरी जीवनशैली में निष्क्रिय आदतें, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना, अनियमित खानपान और उच्च तनाव स्तर प्रमुख विशेषताएं हैं। व्यस्त कार्यसूची के कारण कॉर्पोरेट पेशेवरों को स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखने में अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों के लिए आयुर्वेद समय-समय पर शरीर शोधन और निवारक स्वास्थ्य देखभाल उपायों की सलाह देता है। योग्य चिकित्सकों की सलाह पर समय-समय पर पंचकर्म कराया जा सकता है, जिससे समग्र स्वास्थ्य को समर्थन मिलता है। ऋतु के अनुसार जीवनशैली में बदलाव भी आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। खानपान की आदतों को मौसम, भौगोलिक स्थिति और व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार बदलना चाहिए। भोजन के संयोजन का भी विशेष महत्व है। आयुर्वेद सजग होकर भोजन करने, भोजन के उचित समय का पालन करने तथा अपनी पाचन क्षमता के अनुरूप आहार ग्रहण करने को प्रोत्साहित करता है। इन सिद्धांतों के साथ पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि और तनाव प्रबंधन दीर्घकालिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न: पंचकर्म और सामान्य रूप से आयुर्वेद के माध्यम से आप किस प्रकार की बीमारियों का उपचार करते हैं?

उत्तर: आयुर्वेद शरीर की कार्यप्रणालियों को वात, पित्त और कफ के सिद्धांतों के आधार पर वर्गीकृत करता है। माना जाता है कि इन नियंत्रक तत्वों के असंतुलन से रोग उत्पन्न होते हैं। उपचार की विभिन्न पद्धतियां हैं, जिनमें पंचकर्म, अग्निकर्म और विधाकर्म शामिल हैं। उदाहरण के लिए, अग्निकर्म पारंपरिक रूप से दर्द प्रबंधन तकनीकों से जुड़ा हुआ है। Vedayu में हम मूल और प्रामाणिक पंचकर्म का अभ्यास करते हैं। आयुर्वेदिक उपचारों के माध्यम से जिन रोगों का सामान्यत: उपचार किया जाता है, उनमें साइटिका, फ्रोजन शोल्डर, सर्वाइकल एवं लम्बर स्पॉन्डिलाइटिस, पाचन संबंधी विकार, एसिडिटी, पुरानी गैस, साइनसाइटिस, अस्थमा तथा कुछ गुर्दा संबंधी शिकायतें शामिल हैं। उपचार की सलाह देने से पहले प्रत्येक रोगी का व्यक्तिगत मूल्यांकन किया जाता है।

प्रश्न: आयुर्वेद में प्रौद्योगिकी के उपयोग को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है?

उत्तर: प्रौद्योगिकी ने निस्संदेह स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाया है और यह आयुर्वेद में भी सकारात्मक योगदान दे सकती है, विशेष रूप से चिकित्सा उपकरणों के विकास, निदान सहायता प्रणालियों, अस्पताल प्रबंधन और विनिर्माण प्रक्रियाओं में। हालांकि, आयुर्वेद मूल रूप से चिकित्सकीय अवलोकन, व्यक्तिगत निदान और गुरु-शिष्य परंपरा से प्राप्त ज्ञान पर आधारित है। प्रौद्योगिकी चिकित्सकों की सहायता कर सकती है, लेकिन वह किसी कुशल वैद्य की मानवीय समझ, अनुभव और अंतर्ज्ञान का स्थान नहीं ले सकती। आयुर्वेद की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए पारंपरिक शिक्षण प्रणालियों का संरक्षण और पुनर्जीवन अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न: आयुर्वेद को प्रोत्साहित करने में वर्तमान समय में सरकार की भूमिका के बारे में आपका क्या विचार है?

उत्तर: हाल के वर्षों में आयुर्वेद को लेकर सरकारी समर्थन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने शिक्षा, जागरूकता अभियानों, स्वास्थ्य अवसंरचना और अनुसंधान कार्यक्रमों के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अनेक पहल की हैं। आयुर्वेदिक औषधालयों, वेलनेस केंद्रों और जनस्वास्थ्य जागरूकता गतिविधियों का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। स्वास्थ्य शिविर और वेलनेस कार्यक्रम पहले की तुलना में अधिक बार आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे निवारक स्वास्थ्य देखभाल के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ रही है। आयुर्वेद को समर्पित शैक्षणिक संस्थानों की संख्या भी बढ़ रही है, जो इस पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को मजबूत बनाने की व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, Ajmer में एक आयुर्वेद विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव है, जो Jodhpur के बाद अपनी तरह का दूसरा विश्वविद्यालय होगा। आरोग्य मेलों, जागरूकता अभियानों और शैक्षणिक पहलों के आयोजन ने युवाओं की भागीदारी को बढ़ावा दिया है और देशभर में आयुर्वेद की बढ़ती लोकप्रियता में योगदान दिया है|

प्रश्न: अन्य राज्यों की तुलना में आयुर्वेद के अभ्यास में आप Rajasthan की स्थिति को कैसे देखते हैं?

उत्तर: पिछले कुछ वर्षों में Rajasthan में आयुर्वेद के प्रति जागरूकता और उसके अभ्यास में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। सरकारी समर्थन में वृद्धि, शैक्षणिक पहलों और जनजागरूकता कार्यक्रमों ने इस प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। राज्य में अब आयुर्वेद को समर्पित चिकित्सकों, संस्थानों और वेलनेस सुविधाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ रही है, Rajasthan आयुर्वेदिक शिक्षा, उपचार और अनुसंधान के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरने की मजबूत स्थिति में है।

प्रश्न: आयुर्वेद में किस प्रकार के खाद्य पदार्थों की अनुशंसा की जाती है?

उत्तर: आयुर्वेद शुद्ध, पौष्टिक और प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त खाद्य पदार्थों के सेवन की वकालत करता है। इसमें सामग्री की गुणवत्ता और उनके संयोजन तथा सेवन के तरीके को समान महत्व दिया जाता है। शुद्ध शहद, गुणवत्तापूर्ण तेल, ताजा दूध और घी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। अधिक प्रसंस्कृत विकल्पों की तुलना में सेंधा नमक को अक्सर प्राथमिकता दी जाती है। आयुर्वेद भोजन की अनुकूलता को समझने पर भी जोर देता है, क्योंकि कुछ खाद्य संयोजन स्वास्थ्य को समर्थन दे सकते हैं जबकि कुछ पाचन और शारीरिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ आयुर्वेदिक परंपराओं में बच्चों के लिए स्वर्णप्राशन जैसी विशेष प्रक्रियाएं भी की जाती हैं। अंततः, आहार संबंधी सुझाव व्यक्ति की प्रकृति, आयु, ऋतु और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत रूप से निर्धारित किए जाते हैं।

प्रश्न: शहरी युवाओं में तनाव कम करने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?

उत्तर: आधुनिक जीवन की बढ़ती गति ने तनाव प्रबंधन को स्वास्थ्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक बना दिया है। आयुर्वेद एक समग्र दृष्टिकोण की अनुशंसा करता है, जिसमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का संतुलित समावेश हो। योग और ध्यान का नियमित अभ्यास एकाग्रता बढ़ाने, चिंता कम करने और मानसिक दृढ़ता को मजबूत करने में सहायता कर सकता है। पौष्टिक आहार लेना, पर्याप्त नींद सुनिश्चित करना और अनुशासित दैनिक दिनचर्या का पालन करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

प्रश्न: आयुर्वेद में वर्तमान समय में कौन-कौन से अनुसंधान क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं?

उत्तर: आयुर्वेद में देशभर की अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संस्थाओं में अनुसंधान किया जा रहा है, जिनमें हर्बल फार्माकोलॉजी, एकीकृत चिकित्सा, दीर्घकालिक रोग प्रबंधन और निवारक स्वास्थ्य देखभाल जैसे क्षेत्र शामिल हैं। साथ ही, अनेक चिकित्सकों का मानना है कि शास्त्रीय आयुर्वेदिक ग्रंथों में ज्ञान का एक विशाल भंडार मौजूद है, जो गहन अध्ययन और चिकित्सकीय अनुप्रयोग के माध्यम से निरंतर नए दृष्टिकोण प्रदान करता रहता है। रोगियों का निरंतर अवलोकन, उपचार परिणामों का दस्तावेजीकरण और व्यावहारिक अनुभव आयुर्वेद की उन्नति के महत्वपूर्ण घटक बने हुए हैं। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों का समन्वय भविष्य में विकास की महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रस्तुत करता है।

प्रश्न: जो युवा आयुर्वेद को करियर के रूप में अपनाना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

उत्तर: आयुर्वेद में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों को जिज्ञासा, समर्पण और आजीवन सीखने की प्रतिबद्धता के साथ इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। व्यापक यात्राएं करना, विभिन्न चिकित्सकीय पद्धतियों का अवलोकन करना और अनुभवी वैद्यों के मार्गदर्शन में सीखना उन्हें अमूल्य अनुभव प्रदान कर सकता है। युवा चिकित्सकों को अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलकर इस विधा के भीतर विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए। शास्त्रीय ग्रंथों की गहरी समझ और व्यावहारिक चिकित्सकीय अनुभव का मजबूत आधार सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज के विकसित होते स्वास्थ्य परिदृश्य में आयुर्वेदिक ज्ञान को नवाचार, संचार कौशल और उद्यमशील सोच के साथ जोड़कर न केवल पेशेवर विकास के सार्थक अवसर प्राप्त किए जा सकते हैं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य देखभाल की उन्नति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।



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