Friday, July 3, 2026 |
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समय पर पहचान से वैस्कुलर बीमारियों का बेहतर इलाज संभव: डॉ. आदर्श काबरा

by Business Remedies
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चारु भाटिया | बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। भारत में वैस्कुलर बीमारियां एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रही हैं, जो सभी आयु वर्ग के लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं। वैरिकोज वेन्स से लेकर डीप वेन थ्रॉम्बोसिस और पेरिफेरल आर्टरी डिजीज जैसी जानलेवा स्थितियों तक, समय पर निदान और विशेषज्ञ देखभाल प्रभावी प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस विशेष बातचीत में, एपेक्स हॉस्पिटल्स, जयपुर में वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जरी के निदेशक डॉ. आदर्श काबरा ने सबसे आम वैस्कुलर विकारों, उनके शुरुआती चेतावनी संकेतों, विकसित हो रही डायग्नोस्टिक तकनीकों और इस क्षेत्र में जागरूकता एवं विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। अपने वर्षों के क्लिनिकल अनुभव के आधार पर, उन्होंने रोकथाम, उपचार में प्रगति और देश में वैस्कुलर हेल्थकेयर के सामने आने वाली चुनौतियों पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है।

प्रश्न: आप भारत के एक प्रसिद्ध वैस्कुलर सर्जन हैं और आपके पास व्यापक अनुभव है। क्या आप अपने अभ्यास में सामने आने वाली सबसे सामान्य वैस्कुलर स्थितियों के बारे में विस्तार से बता सकते हैं?

उत्तर: मेरे क्लिनिकल अनुभव में, सबसे सामान्य वैस्कुलर स्थितियों में से एक वैरिकोज वेन्स है, जो लगभग 30 से 40 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करती है। दिलचस्प बात यह है कि बड़ी संख्या में लोग बिना लक्षणों के रहते हैं, जिससे अक्सर निदान में देरी होती है। जब लक्षण दिखाई देते हैं, तो मरीज आमतौर पर पैरों में दर्द, सूजन, खुजली और थकान महसूस करते हैं। दुर्लभ मामलों में खून बहना भी हो सकता है। नसें फैल जाती हैं और टेढ़ीमेढ़ी हो जाती हैं, जिससे उनका सर्प जैसी आकृति बन जाती है। यदि इसका इलाज न किया जाए, तो यह स्थिति त्वचा के रंग में बदलाव और गंभीर मामलों में मामूली चोट के बाद भी अल्सर बनने तक पहुंच सकती है। ये अल्सर बहुत दर्दनाक होते हैं और ठीक होने में कठिनाई होती है। यह समझना जरूरी है कि उपचार केवल लक्षणों को कम करने के बजाय नसों की मूल समस्या को ठीक करने पर केंद्रित होना चाहिए। महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल और शारीरिक बदलाव के कारण इसका खतरा अधिक होता है, जबकि पुरुषों में आनुवंशिक कारण अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। बढ़ती उम्र और निष्क्रिय जीवनशैली भी जोखिम को बढ़ाते हैं। एक अन्य सामान्य स्थिति क्रॉनिक डीप वेन थ्रॉम्बोसिस है। यह तब होता है जब एक पुराने एक्यूट डीप वेन थ्रॉम्बोसिस के बाद मांसपेशियों की गहरी नसें आंशिक रूप से खुली रहती हैं। इसका मुख्य कारण अपर्याप्त या अधूरा उपचार होता है। इन नसों में झिल्लियां बन सकती हैं, जिससे रक्तप्रवाह असामान्य हो जाता है। दर्द, सूजन, थकान और भारीपन इसके सामान्य लक्षण हैं। चलने पर पिंडली में तेज दर्द होना भी एक आम समस्या है। क्रॉनिक डीवीटी बारबार एक्यूट डीवीटी के एपिसोड का कारण बन सकता है।

एक अधिक गंभीर श्रेणी में पेरिफेरल आर्टरी डिजीज और गैंग्रीन शामिल हैं। पेरिफेरल आर्टरी डिजीज मुख्य रूप से धूम्रपान और मधुमेह जैसे जोखिम कारकों से जुड़ी होती है। इसमें अंगों तक रक्त प्रवाह कम हो जाता है, जिससे विशेष रूप से चलने के दौरान तेज दर्द होता है और गंभीर मामलों में ऊतकों की मृत्यु हो सकती है। प्रभावित अंग काले पड़ सकते हैं क्योंकि उन्हें ऑक्सीजन युक्तरक्तनहीं मिल पाता। इसका निदान और उपचार मुख्य रूप से एंजियोग्राफी के आधार पर किया जाता है, क्योंकि यह बीमारी पेट से लेकर पैर की उंगलियों तक कहीं भी हो सकती है। इसके अलावा, एक्यूट डीप वेन थ्रॉम्बोसिस एक अधिक गंभीर और जानलेवा स्थिति है, जिसमें मांसपेशियों या पेट की बड़ी नसों में थक्के बन जाते हैं। यह स्थिति अक्सर ऑपरेशन के बाद के मरीजों में देखी जाती है, खासकर घुटने या कूल्हे की सर्जरी के बाद या प्रसव के बाद महिलाओं में। इसमें दर्द और सूजन बहुत अधिक होती है और आराम या दवाइयों से ठीक नहीं होती। इसका सबसे बड़ा खतरा पल्मोनरी एम्बोलिज्म है, जिसमें थक्का फेफड़ों तक पहुंच जाता है। कुछ मामलों में आईवीसी फिल्टर का उपयोग किया जाता है, लेकिन अंतिम उपचार के लिए अक्सर थक्का तुरंत निकालना पड़ता है।

प्रश्न: आपके अनुसार भारत में वैस्कुलर बीमारियों का अक्सर निदान क्यों नहीं हो पाता या देर से होता है?

उत्तर: यह कहना गलत होगा कि भारत में वैस्कुलर बीमारियों का बिल्कुल निदान नहीं होता, बल्कि समस्या देर से निदान और गलत रेफरल प्रणाली की है। एक योग्य वैस्कुलर सर्जन तक समय पर पहुंचना एक बड़ी चुनौती है। पहले के समय में उपचार के विकल्प सीमित थे, लेकिन अब इस क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। फिर भी, आज भी कई मरीजों का इलाज ऐसे डॉक्टरों द्वारा किया जाता है जिन्हें वैस्कुलर चिकित्सा में विशेष प्रशिक्षण नहीं होता। इसके कारण मरीजों को अक्सर कार्डियोलॉजी या जनरल सर्जरी विभाग में भर्ती किया जाता है, जहां वैस्कुलर समस्याओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। इससे उपचार के परिणाम प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, कई मरीज बीमारी के अंतिम चरण में ही डॉक्टर के पास जाते हैं, जब इलाज के विकल्प सीमित हो जाते हैं। यही कारण है कि अंग काटने के मामलों की संख्या अधिक है, जिन्हें समय पर सही उपचार से रोका जा सकता है।

प्रश्न: क्या शरीर वैस्कुलर बीमारियों के शुरुआती संकेत देता है?

उत्तर: हां, शरीर शुरुआती चेतावनी संकेत देता है, लेकिन ये अक्सर हल्के होते हैं और नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। पैरों में दर्द, सूजन, त्वचा में बदलाव या भारीपन जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। वैस्कुलर बीमारियां आमतौर पर महीनों या वर्षों में विकसित होती हैं, जिससे शुरुआती पहचान का पर्याप्त समय मिलता है। इन संकेतों को समझना और समय पर कार्रवाई करना जरूरी है। इन्हें नजरअंदाज करने से बीमारी गंभीर रूप ले सकती है, जिससे उपचार और रिकवरी दोनों कठिन हो जाते हैं।

प्रश्न: स्वस्थ रक्तवाहिकाओं के लिए आप कौन से बचाव उपाय सुझाएंगे?

उत्तर: वैस्कुलर स्वास्थ्य के लिए बचाव बेहद महत्वपूर्ण है। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार वाली जीवनशैली अपनाना जरूरी है। व्यायाम से रक्त संचार बेहतर होता है और नसें स्वस्थ रहती हैं। चलना, दौडऩा, योग या हल्का एरोबिक व्यायाम बहुत फायदेमंद होता है। मधुमेह जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखना भी जरूरी है, क्योंकि ये वैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ाती हैं। धूम्रपान, यहां तक कि परोक्ष धूम्रपान भी, वैस्कुलर स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है और इससे बचना चाहिए। शराब का अधिक सेवन भी सीमित करना चाहिए।

प्रश्न: डायग्नोस्टिक तकनीकों में प्रगति से वैस्कुलर हेल्थकेयर में क्या सुधार हुआ है?

उत्तर: डायग्नोस्टिक तकनीकों में प्रगति ने वैस्कुलर चिकित्सा को पूरी तरह बदल दिया है। पहले निदान के तरीके सीमित और कम सटीक थे, लेकिन अब अल्ट्रासाउंड, सीटी और एमआरआई जैसी आधुनिक तकनीकों से रक्त वाहिकाओं की सटीक जानकारी मिलती है।

एंजियोग्राम अब वैस्कुलर बीमारियों के निदान का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है, जिससे ब्लॉकेज की सही जगह और गंभीरता का पता चलता है। इससे जल्दी और सटीक उपचार संभव हो पाया है। इसके अलावा, अब वैस्कुलर सर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट, फिजिशियन, नेफ्रोलॉजिस्ट और डायबेटोलॉजिस्ट के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिलता है, जिससे मरीजों को समग्र उपचार मिल पाता है।

प्रश्न: वैस्कुलर सर्जरी को लेकर कई भ्रम हैं। क्या आप उन्हें स्पष्ट कर सकते हैं?

उत्तर: वैस्कुलर बीमारियों और उनके इलाज को लेकर कई गलतफहमियां हैं। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि गैंग्रीन या पेरिफेरल आर्टरी डिजीज होने पर अंग काटना ही एकमात्र विकल्प होता है, जबकि यह सही नहीं है। समय पर सही उपचार से कई मामलों में अंग को बचाया जा सकता है। अक्सर यह भी कहा जाता है कि गैंग्रीन होने पर तुरंत अंग काट देना चाहिए, जबकि पहले रक्त प्रवाह को सुधारना अधिक जरूरी होता है। इसके बाद ही आगे का उपचार करना चाहिए। एक और चिंता की बात यह है कि कई लोग अप्रमाणित चिकित्सकों या तथाकथित चमत्कारी इलाज पर भरोसा करते हैं, जिससे सही इलाज में देरी होती है और स्थिति बिगड़ जाती है। लोगों को योग्य वैस्कुलर विशेषज्ञ से ही उपचार कराना चाहिए। यह भी महत्वपूर्ण है कि आधुनिक वैस्कुलर सर्जरी अब काफी उन्नत हो चुकी है और इसमें मिनिमली इनवेसिव तकनीकों का उपयोग होता है, जिससे रिकवरी जल्दी होती है और जटिलताएं कम होती हैं। मरीजों को अपने डॉक्टर की योग्यता की जांच जरूर करनी चाहिए।

प्रश्न: भारत में वैस्कुलर सर्जरी प्रशिक्षण में क्या कमियां हैं?

उत्तर: सबसे बड़ी समस्या देश में प्रशिक्षण केंद्रों का असमान वितरण है। अधिकतर वैस्कुलर सर्जरी प्रशिक्षण संस्थान दक्षिण भारत में हैं, जबकि उत्तर भारत में इसकी कमी है। इसके अलावा, कई मेडिकल कॉलेजों में वैस्कुलर सर्जरी को अलग विषय के रूप में पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है, जिससे प्रशिक्षण की संरचना मजबूत नहीं हो पाती। इससे विशेषज्ञों की कमी बनी रहती है और गलत इलाज की समस्या बढ़ती है। एक और गंभीर समस्या यह है कि कुछ अप्रमाणित लोग खुद को वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जन बताकर मरीजों का इलाज करते हैं, जो मरीजों के लिए खतरनाक है। इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं को मजबूत करना, जागरूकता बढ़ाना और सख्त नियम लागू करना बेहद जरूरी है।



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