दुनिया में भारत चौथा सबसे युवा देश माना जाता है, परंतु पिछले दिनों जारी की गई संयुक्त राष्टï्र की रिपोर्ट ने देश के लिए चिंता बढ़ा दी है। इसका प्रमुख कारण बुजुर्गों की संख्या में होती बढ़ोतरी है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1961 से 2001 तक बुजुर्गों की आबादी बढऩे की रफ्तार कम रही लेकिन उसके बाद इसमें तेजी से वृद्धि शुरू हो गई है। 2050 तक देश में कुल आबादी के 20.8 प्रतिशत अर्थात 60 वर्ष से अधिक आयु वाले लगभग 35 करोड़ बुजुर्ग होंगे जिनकी संख्या इस समय 10 प्रतिशत के आसपास है। इसका मतलब यह हुआ कि वर्ष 2050 तक भारत में हर 100 में से 21 लोग बूढ़े होंगे। ऐसे में वर्तमान स्वास्थ्य प्रणाली बुजुर्गों की बढ़ती जरूरतें पूरी करने में नाकाफी है। वैसे भी 60 वर्ष की आयु के बाद सरकार द्वारा बुजुर्गों के स्वास्थ्य की सामान्य जांच करके उन्हें विभिन्न रोगों के प्रकोप से बचाने के लिए शरीर के लिए जरूरी सप्लीमेंट्स दिए जाने चाहिए। जीवन की संïध्या में बुजुर्गों को उचित देखभाल मिले और वे देश के लिए उपयोगी नागरिक सिद्ध हो सके।
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं की औसत आयु पुरुषों से अधिक होने के कारण भविष्य में देश में विधवा महिलाओं की संख्या अधिक होगी, इसलिए सामाजिक,आॢथक नीतियों पर ध्यान देने की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार बुजुर्गों की आयु में वृद्धि के अनुपात में उनके स्वास्थ्य, विशेषकर पुरानी बीमारियों के लिए देखभाल सेवाओं में वृद्धि नहीं हुई तथा पंजाब व हिमाचल में बुजुर्गों की देखभाल के लिए डाक्टरों और विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी एक चुनौती बन रही है। यह भी माना जा रहा है कि बुजुर्ग आबादी बहुत असुरक्षित है और उन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता है। अधिकांश बुजुर्गों के पास वित्तीय स्वतंत्रता नहीं होने के कारण उनके इलाज के लिए होने वाले खर्चों को कम करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए डाक्टरों की संख्या, बुनियादी ढांचे और उपकरणों को बढ़ाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना, स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार करना और मुफ्त सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

