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बदलती दंत चिकित्सा आदतें: स्वास्थ्य, स्वच्छता और मुस्कान पर डॉ. प्रज्ञा कवाड़िया की दृष्टि

by Business Remedies
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चारू भाटिया | जयपुर

दांतों और मुंह का स्वास्थ्य अब केवल दर्द होने पर डॉक्टर के पास जाने तक सीमित नहीं रहा है। नियमित जांच, बचाव आधारित देखभाल, खूबसूरत मुस्कान, डिजिटल डेंटिस्ट्री और आधुनिक उपचार तकनीकों के प्रति बढ़ती जागरूकता ने दंत चिकित्सा के क्षेत्र को पिछले एक दशक में काफी बदल दिया है। आज लोग यह समझने लगे हैं कि स्वस्थ दांत केवल खूबसूरत मुस्कान के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

इस विशेष बातचीत में डॉ. प्रज्ञा कवाड़िया, संस्थापक, डेंटिज्म डेंटल हॉस्पिटल, जयपुर, ने डेंटल साइंसेज में अपने सफर, डेंटल प्रैक्टिस शुरू करने की चुनौतियों, मरीजों की बदलती सोच, कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक की भूमिका के साथसाथ बचाव आधारित दंत चिकित्सा के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

प्रश्न: आप डेंटिज्म डेंटल हॉस्पिटल की संस्थापक हैं। अपने अब तक के सफर और डेंटल साइंसेज को करियर के रूप में चुनने की प्रेरणा के बारे में बताइए।

उत्तर: डेंटिस्ट्री को करियर के रूप में चुनने की मेरी प्रेरणा एक व्यक्तिगत अनुभव से मिली। जब मैं 12वीं कक्षा में थी, तब मेरी मां को दांतों में काफी दर्द हुआ था। उस समय मैंने महसूस किया कि उन्हें जिस तरह का डेंटल ट्रीटमेंट मिल रहा था, उसमें स्वच्छता का वह स्तर नहीं था जिसकी मैं अपेक्षा करती थी। इस अनुभव ने मेरे मन में डेंटिस्ट्री के प्रति रुचि पैदा की और मुझे यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि दंत चिकित्सा को और बेहतर तथा सुरक्षित तरीके से कैसे किया जा सकता है।

इसके बाद मैंने डेंटल साइंसेज की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए एक साल का गैप लिया और जयपुर डेंटल कॉलेज से बीडीएस किया। पढ़ाई के दौरान मुझे यह समझ आया कि ओरल हेल्थ का संबंध शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य से है। डेंटिस्ट्री केवल दांत के दर्द का इलाज करने तक सीमित नहीं है।

वर्ष 2014 में मैंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्माइल डिजाइनिंग में सर्टिफिकेट कोर्स किया। इसके बाद मुंबई के इम्पार्ट एजुकेशन से फुल माउथ रिहैबिलिटेशन का कोर्स किया। मैंने अपने पति और साथी डेंटिस्ट डॉ. अमित गुप्ता के साथ जयपुर में डेंटिज्म डेंटल हॉस्पिटल की शुरुआत की। आज डेंटिज्म की चार शाखाएं हैंदो जयपुर में, एक मुंबई में और एक भीलवाड़ा में। यह सफर चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन बेहद संतोषजनक भी रहा है।

प्रश्न: पिछले एक दशक में डेंटिस्ट्री के क्षेत्र में किस तरह के बदलाव आए हैं?

उत्तर: लोगों के दंत स्वास्थ्य को लेकर नजरिए में बहुत बड़ा बदलाव आया है। पहले अधिकतर लोग तब डेंटिस्ट के पास जाते थे जब दांतों में दर्द होता था या समस्या काफी बढ़ चुकी होती थी। अब लोग नियमित डेंटल चेकअप और बचाव आधारित देखभाल के महत्व को समझने लगे हैं।

इसके अलावा लोग अब अपनी मुस्कान और दांतों की खूबसूरती को लेकर भी अधिक जागरूक हैं। उन्हें यह समझ में आया है कि डेंटिस्ट्री केवल दांतों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को बेहतर करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्कान को बेहतर बनाकर आत्मविश्वास बढ़ाने में भी मदद कर सकती है। यही वजह है कि स्माइल करेक्शन और कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री को लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है।

प्रश्न: जयपुर में अपनी डेंटल प्रैक्टिस शुरू करते समय आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

उत्तर: सबसे बड़ी चुनौती लोगों की मानसिकता थी। उस समय जयपुर में दंत स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता आज की तुलना में कम थी। बहुत से लोग तब ही डेंटिस्ट के पास जाते थे जब दांतों में समस्या पैदा हो जाती थी।

मेरी पढ़ाई के दौरान मैंने सीखा कि इलाज से बेहतर बचाव है। प्राकृतिक दांतों का कोई विकल्प नहीं है। कृत्रिम दांत या अन्य विकल्प कितने भी अच्छे हों, वे प्राकृतिक दांतों की जगह पूरी तरह नहीं ले सकते। इसलिए लोगों को अपने प्राकृतिक दांतों की देखभाल पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए।

एक अन्य चुनौती गुणवत्तापूर्ण डेंटिस्ट्री की लागत है। आधुनिक उपकरण, तकनीक और इंस्ट्रूमेंट्स काफी महंगे होते हैं। इसके बावजूद मरीज को व्यक्तिगत और उसकी जरूरत के अनुसार उपचार देना बहुत जरूरी है। डेंटिज्म में हम दांत निकालने से लेकर इम्प्लांट तक विभिन्न प्रक्रियाएं करते हैं और मरीज की आवश्यकता के अनुसार उपचार की योजना बनाते हैं।

प्रश्न: दांतों और मुंह से जुड़े किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

उत्तर: अगर मुंह से लगातार दुर्गंध आती है और नियमित सफाई के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो डेंटिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। अगर भोजन बारबार दांतों के बीच फंसता है, तो भी इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति केवल मुंह की एक तरफ से खाना चबा पा रहा है, तो इसके पीछे कोई दंत समस्या हो सकती है। मसूड़ों से खून आना, दांतों में अत्यधिक संवेदनशीलता और लगातार होने वाली असुविधा भी जांच की जरूरत का संकेत हैं।

यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से मुंह खोलकर सोता है, तो इससे मुंह में सूखापन और अन्य समस्याएं हो सकती हैं। ऐसी स्थिति लगातार बनी रहे तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

प्रश्न: क्या बहुत सफेद दांत होने का मतलब है कि व्यक्ति को कोई दंत समस्या नहीं है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। दांतों का रंग दंत स्वास्थ्य का एकमात्र पैमाना नहीं है। हर व्यक्ति के दांतों का प्राकृतिक रंग अलग होता है और कई कारक इसे प्रभावित करते हैं।

किसी व्यक्ति के दांत बहुत सफेद हो सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद दांतों के बीच गैप, कैविटी, मसूड़ों की समस्या या बाइट से जुड़ी परेशानी हो सकती है। इसलिए दांत कितने सफेद हैं, इसे देखकर उनके स्वास्थ्य का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।

प्रश्न: जनरल और कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री में क्या अंतर है?

उत्तर: जनरल डेंटिस्ट्री मुख्य रूप से दांतों की बीमारी और कार्यात्मक समस्याओं के निदान तथा उपचार से संबंधित है। इसमें कैविटी, दांतों का दर्द, संक्रमण और अन्य समस्याएं शामिल हैं।

कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री का मुख्य उद्देश्य दांतों और मुस्कान के स्वरूप को बेहतर करना है। इसमें दांतों के रंग, गैप और मुस्कान की बनावट से जुड़ी समस्याओं को ठीक किया जा सकता है। मरीज की जरूरत के अनुसार अलाइनर्स, ब्रेसेज, विनियर्स और अन्य प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है।

आज कई लोगों के लिए मुस्कान उनके आत्मविश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री की मांग बढ़ रही है।

प्रश्न: आधुनिक डेंटिस्ट्री में एआई और तकनीक की भूमिका को आप किस तरह देखती हैं?

उत्तर: तकनीक डेंटिस्ट्री को लगातार बेहतर बना रही है। आज डिजिटल स्कैनर की मदद से पूरे मुंह का विस्तृत स्कैन लिया जा सकता है, जिससे निदान और उपचार की योजना बनाने में सुविधा होती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी एक सहायक तकनीक के रूप में सामने रही है। यह कुछ समस्याओं को शुरुआती स्तर पर पहचानने और डायग्नोसिस में सहायता कर सकती है। हालांकि, एआई को डेंटिस्ट की विशेषज्ञता और निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। इसका इस्तेमाल डॉक्टर की क्षमता को मजबूत करने वाले साधन के रूप में किया जाना चाहिए।

प्रश्न: नियमित डेंटल चेकअप कब से शुरू होना चाहिए?

उत्तर: डेंटल केयर की शुरुआत बच्चे के पहले दूध के दांत निकलने के साथ ही हो जानी चाहिए। मातापिता को यह नहीं सोचना चाहिए कि दूध के दांत तो गिर जाएंगे, इसलिए उनकी देखभाल की जरूरत नहीं है।

यदि किसी वयस्क को कोई समस्या नहीं है, तो साल में एक बार डेंटल चेकअप कराया जा सकता है। लेकिन दर्द, संवेदनशीलता, मसूड़ों से खून या किसी अन्य लगातार समस्या की स्थिति में वार्षिक जांच का इंतजार नहीं करना चाहिए।

प्रश्न: दांतों की बेहतर देखभाल के लिए कौन से बचाव के उपाय अपनाए जा सकते हैं?

उत्तर: फ्लॉसिंग सबसे उपयोगी आदतों में से एक है। इससे दांतों के बीच की उन जगहों को साफ करने में मदद मिलती है जहां टूथब्रश आसानी से नहीं पहुंच पाता। उम्र बढ़ने या जरूरत के अनुसार वॉटर फ्लॉसर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

टूथपेस्ट का सही चुनाव भी जरूरी है। संवेदनशील दांतों वाले लोगों को विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार टूथपेस्ट चुनना चाहिए। इसी तरह माउथवॉश का इस्तेमाल भी जरूरत के अनुसार होना चाहिए और इसे ब्रशिंग या फ्लॉसिंग का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

लोगों को यह भी समझना चाहिए कि ओरल हेल्थ की समस्याएं हमेशा केवल दांतों और मसूड़ों तक सीमित नहीं होतीं। मुंह से जुड़े किसी भी हिस्से में लगातार दर्द या असुविधा हो तो उसकी जांच करवानी चाहिए।

प्रश्न: डेंटल स्टडीज के पाठ्यक्रम में आप किन बदलावों की सिफारिश करेंगी?

उत्तर: मेरा मानना है कि डेंटल शिक्षा में प्रायोगिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण को और अधिक महत्व मिलना चाहिए। थ्योरी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी बीमारी को समझने और सही डायग्नोसिस तक पहुंचने के लिए मजबूत शैक्षणिक आधार जरूरी है।

लेकिन प्रैक्टिकल एक्सपोजर छात्रों को वास्तविक मरीजों और परिस्थितियों के साथ काम करने का अनुभव देता है। इसलिए पाठ्यक्रम में थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के बीच संतुलन होना चाहिए। इससे भविष्य के डेंटिस्ट अधिक आत्मविश्वास और बेहतर क्लिनिकल समझ के साथ पेशे में प्रवेश कर सकेंगे।

प्रश्न: अंत में, आप उभरते हुए डेंटिस्ट्स को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: डेंटिस्ट्री एक बेहद रोचक और लगातार विकसित होने वाला क्षेत्र है। आने वाले समय में इसकी जरूरत और महत्व और बढ़ेगा। हालांकि, युवा डेंटिस्ट्स को फोकस्ड रहने, लगातार सीखते रहने और अपने पेशे के प्रति ईमानदार रहने की जरूरत है।

 



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