चारु भाटिया | जयपुर
गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी ने पिछले कुछ दशकों में काफी बदलाव देखा है। पारंपरिक जांच पद्धतियों से आगे बढ़ते हुए आज यह क्षेत्र अत्याधुनिक इमेजिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन मेडिसिन जैसी तकनीकों से जुड़ चुका है। दूसरी ओर, फैटी लिवर डिजीज, मोटापा, पाचन संबंधी समस्याएं और तनाव से जुड़ी आंतों की परेशानियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। इस बातचीत में एपेक्स हॉस्पिटल्स, मालवीय नगर, जयपुर के कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अशोक कुमार दुधवाल ने चिकित्सा क्षेत्र में अपने सफर, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी में हो रहे बदलावों, आम पाचन और लिवर संबंधी बीमारियों, जीवनशैली, नई तकनीकों और इस विशेषज्ञता के भविष्य पर विस्तार से चर्चा की।
प्रश्न: आप एपेक्स हॉस्पिटल्स, मालवीय नगर, जयपुर में एक प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट हैं। अब तक के अपने सफर और चिकित्सा क्षेत्र चुनने की प्रेरणा के बारे में बताइए।
उत्तर: मैं जयपुर के पास स्थित जॉबनेर से हूं। चिकित्सा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मुझे अपने अंकल से मिली, जो स्वयं डॉक्टर थे। उनका पेशा और लोगों की सेवा करने का अवसर मुझे काफी प्रभावित करता था। मैंने 2018 में एम्स, दिल्ली से एमबीबीएस किया और इसके बाद वहीं से मेडिसिन में एमडी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद विशेषज्ञता के लिए आगे बढ़ते हुए 2025 में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी में डीएम किया। इसके बाद से मैं एपेक्स हॉस्पिटल्स, मालवीय नगर, जयपुर में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। यह सफर चुनौतीपूर्ण होने के साथ बेहद संतोषजनक भी रहा है, क्योंकि चिकित्सा ऐसा पेशा है जिसमें आप सीधे लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
प्रश्न: पिछले कुछ वर्षों में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी किस तरह बदली है?
उत्तर: गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी में बहुत बड़ा बदलाव आया है। 1990 के दशक में एंडोस्कोप का इस्तेमाल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं की जांच और उपचार के लिए किया जाता था, लेकिन उस समय उपकरण अपेक्षाकृत कठोर होते थे और प्रक्रियाएं मरीजों के लिए असहज हो सकती थीं। फाइबर–ऑप्टिक एंडोस्कोपी के विकास के साथ डॉक्टरों को शरीर के अंदर बेहतर पहुंच और दृश्यता मिलने लगी। धीरे–धीरे हाई–डेफिनिशन इमेजिंग और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों ने आंतरिक अंगों में असामान्यताओं की पहचान को और बेहतर बनाया।
आज ऐसी कई प्रक्रियाएं, जिनके लिए पहले अधिक आक्रामक सर्जरी की आवश्यकता पड़ती थी, एंडोस्कोपिक तकनीकों के माध्यम से की जा सकती हैं। प्रक्रियाएं पहले की तुलना में कम दर्दनाक और अधिक सटीक हुई हैं। एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड यानी EUS ने भी उपचार की संभावनाओं का विस्तार किया है। कुछ चुनिंदा मामलों में EUS-गाइडेड प्रक्रियाओं के माध्यम से शरीर के भीतर मौजूद कलेक्शन को ड्रेन करने या स्टेंट की मदद से आंतरिक रास्ता बनाने जैसे उपचार किए जा सकते हैं। इससे जांच और उपचार दोनों अधिक प्रभावी और कम आक्रामक हुए हैं।
प्रश्न: क्लिनिकल प्रैक्टिस में आप गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर से जुड़ी कौन–सी सामान्य समस्याएं देखते हैं?
उत्तर: हमारे पास कई तरह की समस्याओं से पीड़ित मरीज आते हैं। इनमें क्रॉनिक लिवर डिजीज, सिरोसिस, पेट में पानी भरना, हेपेटाइटिस से जुड़ी जटिलताएं और फैटी लिवर डिजीज शामिल हैं। इसके अलावा पैंक्रियाज से जुड़ी समस्याएं भी देखी जाती हैं, जिनमें पैंक्रियाज में सूजन और सिस्टिक घाव शामिल हैं। इनका संबंध कई बार शराब के सेवन और धूम्रपान जैसे कारकों से भी हो सकता है।
पित्त की पथरी, गैस्ट्राइटिस, पेप्टिक अल्सर, पेट दर्द, मल में खून और फंक्शनल डिस्पेप्सिया भी आम समस्याएं हैं। फंक्शनल डिस्पेप्सिया का संबंध गट–ब्रेन एक्सिस में गड़बड़ी से हो सकता है। इसलिए गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी का क्षेत्र सामान्य पाचन संबंधी शिकायतों से लेकर जटिल लिवर, पैंक्रियाज और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों तक काफी व्यापक है।
प्रश्न: अच्छी आंत और लिवर सेहत बनाए रखने के लिए आप किन जीवनशैली बदलावों की सलाह देते हैं?
उत्तर: नियमित शारीरिक गतिविधि बेहद महत्वपूर्ण है। व्यक्ति अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार कोई भी ऐसी एक्सरसाइज चुन सकता है जिसे लंबे समय तक जारी रखा जा सके। जिम जाना, साइकिल चलाना या तेज गति से पैदल चलना इसके विकल्प हो सकते हैं। आदर्श रूप से हर दिन कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि का लक्ष्य रखना चाहिए।
डाइट की भी अहम भूमिका है। प्रोसेस्ड फूड को सीमित करना चाहिए और अत्यधिक तेल, अस्वास्थ्यकर वसा तथा मीठे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। कुछ लोगों में लैक्टोज इनटॉलरेंस होता है, जिसके कारण दूध और डेयरी उत्पादों को पचाने में परेशानी हो सकती है। ऐसे लोगों को अपने ट्रिगर की पहचान कर उन्हें नियंत्रित करना चाहिए।
शराब का लिवर पर महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और खासकर लिवर की बीमारी से पीड़ित लोगों को इससे बचना चाहिए। धूम्रपान न केवल पाचन तंत्र बल्कि पूरे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है और इसे छोड़ना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली कई गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर संबंधी बीमारियों से बचाव के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है।
प्रश्न: फैटी लिवर डिजीज के पीछे प्रमुख कारण क्या हैं?
उत्तर: फैटी लिवर अपने आप में एक निष्कर्ष है और इसके कई कारण हो सकते हैं। अत्यधिक शराब का सेवन इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। मोटापा, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और मेटाबॉलिक समस्याएं भी इसमें योगदान कर सकती हैं। कुछ लंबे समय तक ली जाने वाली दवाएं भी लिवर को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका आकलन हर व्यक्ति के मामले में अलग–अलग किया जाना चाहिए।
जब लिवर में अधिक मात्रा में वसा जमा हो और इसके साथ मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हों तथा शराब मुख्य कारण न हो, तो इसे नए वर्गीकरण के अनुसार MASLD यानी मेटाबॉलिक डिसफंक्शन–एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज कहा जा सकता है।
जीवनशैली में बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। वजन कम करने से लिवर की सेहत में काफी सुधार हो सकता है और उपयुक्त मरीजों में शरीर के वजन का लगभग 10 प्रतिशत कम करना लाभकारी हो सकता है। सेमाग्लूटाइड जैसी नई दवाओं की भूमिका पर भी मेटाबॉलिक लिवर डिजीज में अध्ययन चल रहे हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल केवल डॉक्टर की सलाह और निगरानी में होना चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और कैलोरी पर नियंत्रण लंबे समय तक वजन को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं।
प्रश्न: AI और आधुनिक तकनीकें गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी को किस तरह बदल रही हैं?
उत्तर: तकनीक ने जांच और उपचार दोनों को बदल दिया है। आज हमारे पास ऐसी उन्नत एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं हैं, जिनकी मदद से पारंपरिक सर्जरी के बिना कई स्थितियों का उपचार किया जा सकता है। इसका एक उदाहरण POEM यानी पेरोरल एंडोस्कोपिक मायोटॉमी है। यह मुंह के रास्ते एंडोस्कोप की मदद से की जाने वाली कम आक्रामक प्रक्रिया है, जिसमें बाहरी चीरा लगाए बिना कुछ विशेष मांसपेशी तंतुओं को काटा जाता है। इसका इस्तेमाल कुछ निगलने संबंधी विकारों के उपचार में किया जा सकता है।
दूसरी तकनीक ESD यानी एंडोस्कोपिक सबम्यूकोसल डिसेक्शन है, जिसके माध्यम से कुछ बड़े पॉलीप और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट के शुरुआती चरण के चुनिंदा कैंसर को हटाया जा सकता है। EUS-गाइडेड गैस्ट्रोएंटेरोस्टॉमी भी एक उन्नत प्रक्रिया है, जिसमें चुनिंदा मरीजों में विशेष स्टेंट की सहायता से पेट और छोटी आंत के बीच नया रास्ता बनाया जा सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी तेजी से उपयोगी हो रहा है। AI-सहायता प्राप्त एंडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी संदिग्ध घावों की पहचान करने और शुरुआती असामान्यताओं, जिनमें संभावित कैंसरयुक्त वृद्धि भी शामिल है, का पता लगाने में मदद कर सकती है। समय पर पहचान से उपचार भी जल्दी शुरू किया जा सकता है और परिणाम बेहतर हो सकते हैं।
प्रश्न: गैस्ट्रो और लिवर की सेहत को लेकर लोगों में सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
उत्तर: एक आम गलतफहमी यह है कि कुछ ओवर–द–काउंटर या हर्बल उत्पाद अपने आप लिवर के लिए फायदेमंद होते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोग मानते हैं कि Liv.52 या आयुर्वेदिक हर्बल तैयारियां लिवर की बीमारी का प्रमाणित उपचार हैं। हालांकि, मरीजों को समझना चाहिए कि वैज्ञानिक रूप से स्थापित उपचार लिवर की विशेष बीमारी पर निर्भर करता है और बिना सलाह दवा लेना कभी–कभी नुकसानदायक हो सकता है।
लोग गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षणों के लिए भी खुद दवाएं लेना शुरू कर देते हैं। कभी–कभार होने वाली एसिडिटी को उचित चिकित्सकीय सलाह के बाद पैंटोप्राजोल जैसी दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन लगातार बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बार–बार उल्टी, लगातार पेट दर्द, एनीमिया, बिना कारण वजन कम होना या मल में खून जैसे चेतावनी संकेतों पर उचित चिकित्सकीय जांच जरूरी है। ऐसे में बार–बार खुद उपचार करने के बजाय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए।
प्रश्न: आज गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी में रिसर्च के प्रमुख क्षेत्र कौन–से हैं?
उत्तर: MASLD और इससे जुड़ी मेटाबॉलिक लिवर बीमारियों के लिए अधिक प्रभावी दवाएं विकसित करने पर काफी शोध हो रहा है। इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम यानी IBS के कारणों और इसके पीछे की प्रक्रियाओं को समझने पर भी काम किया जा रहा है। पैंक्रियाटाइटिस भी एक महत्वपूर्ण शोध क्षेत्र है, क्योंकि कई मरीजों में इसके सटीक कारण का पता नहीं चल पाता। इन बीमारियों के जैविक तंत्र को बेहतर ढंग से समझने से भविष्य में लक्षित उपचार विकसित किए जा सकते हैं।
प्रश्न: तनाव गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करता है?
उत्तर: तनाव का गट–ब्रेन एक्सिस पर गहरा प्रभाव पड़ता है और यह इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम तथा फंक्शनल डिस्पेप्सिया जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। हालांकि तनाव शायद ही कभी इसका एकमात्र कारण होता है। गट माइक्रोबायोम में बदलाव, आंतों में हल्का संक्रमण या सूजन, कुछ खाद्य पदार्थों के प्रति संवेदनशीलता और आनुवंशिक कारक भी भूमिका निभा सकते हैं।
प्रश्न: अंत में, युवा मेडिकल विद्यार्थियों और डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: मेरा संदेश सरल है—चिकित्सा को केवल पैसा कमाने के साधन के रूप में नहीं चुनना चाहिए। यह एक ऐसा पेशा है जिसमें समर्पण, नैतिकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। यदि आप वास्तव में लोगों की सेवा करना चाहते हैं और उनके दर्द को समझ सकते हैं, तो चिकित्सा आपके लिए बेहद संतोषजनक करियर साबित हो सकती है।
किसी मरीज को स्वस्थ होते देखना और उसके जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में योगदान देना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि और संतोष है। इसलिए युवा डॉक्टरों को करियर की शुरुआत करुणा, ईमानदारी और समाज की सेवा की वास्तविक भावना के साथ करनी चाहिए।

