भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल दीप जलाने और आतिशबाजी करने का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में प्रकाश, समृद्धि, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करने वाला महापर्व है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ होकर पांच दिनों तक चलने वाला यह दीपोत्सव भारतीय लोकजीवन, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का अनुपम संगम है। धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के रूप में मनाए जाने वाले इन पांच पर्वों का अपना विशिष्ट महत्व है। दीपोत्सव का शुभारंभ धनतेरस से होता है। यह पर्व धन, आरोग्य और समृद्धि का प्रतीक है। भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ लोग सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं। इस दिन खरीदारी की परंपरा हमारी आर्थिक गतिविधियों को भी गति प्रदान करती है। इसके बाद नरक चतुर्दशी अथवा छोटी दीपावली आती है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन से नकारात्मकता दूर करने का संदेश देती है। दीपावली इस पांच दिवसीय उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे थे और उनके स्वागत में नगरवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। तभी से दीपावली अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बन गई। घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीप प्रज्वलित कर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की आराधना की जाती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, आशा और विश्वास का दीप सदैव प्रज्जवलित रखना चाहिए। इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन होता है। यह पर्व प्रकृति, पर्यावरण, पशुधन और कृषि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है। वहीं भाई दूज भाई-बहन के अटूट स्नेह और पारिवारिक संबंधों की मधुरता का प्रतीक है। बदलते समय में दीपावली के स्वरूप में कई बदलाव आए हैं। दिखावे, अनावश्यक खर्च, मिलावट और प्रदूषण ने पर्व की मूल भावना को कहीं-कहीं प्रभावित किया है। पटाखों से होने वाला वायु एवं ध्वनि प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों के लिए भी नुकसानदेह है। ऐसे में हमें पर्यावरण अनुकूल दीपावली मनाने का संकल्प लेना चाहिए। मिट्टी के दीपक, स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन देकर इस पर्व को आत्मनिर्भरता से भी जोड़ा जा सकता है।

