Friday, September 18, 2026 |
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डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए एक नई परीक्षा

by Business Remedies
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हाल ही में यूपीआई लेन-देन के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क में बदलाव की चर्चा ने छोटे व्यापारियों और आम ग्राहकों की चिंताएं बढ़ा दी है। इस नीतिगत बदलाव का सीधा असर देश के वित्तीय आस्तित्व और डिजिटल भुगतान की गति पर पडऩा तय है। यदि मर्चेंट पर शुल्क लगता है, तो संभावना है कि व्यापारी यह बोझ अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों पर डाल सकते हैं। हालांकि, सरकार का जोर डिजिटल भुगतान को मुफ्त बनाए रखने पर है, लेकिन शुल्क तय होने पर छोटे लेन-देन पर अतिरिक्त प्रभार लगने का जोखिम पैदा हो सकता है। शून्य एमडीआर नीति के कारण छोटे दुकानदारों को भुगतान स्वीकार करने में आसानी थी। यदि नया फ्रेमवर्क लागू होता है, तो मार्जिन कम होने से उन्हें वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है। एमएसएमई पहले से ही नकदी और परिचालन लागत के संकट से जूझ रहे हैं। एमडीआर लागू होने से उनकी डिजिटल लागत बढ़ेगी, जिससे वे नकद लेन-देन की ओर वापस लौट सकते हैं। बैंकिंग प्रणाली और फिनटेक कंपनियों के रखरखाव और बुनियादी ढांचे के लिए राजस्व का स्त्रोत जरूरी है। बिना किसी वित्तीय मॉडल के डिजिटल भुगतान को अनिश्चितकाल तक चलाना बैंकों के लिए घाटे का सौदा बनता जा रहा था। इससे डिजिटल भुगतान ढांचे की सुरक्षा मजबूत होगी, साइबर धोखाधड़ी घटेगी और बैंकिंग सेक्टर को नवाचार के लिए वित्तीय बल मिलेगा। सरकार को मध्यम और बड़े व्यापारियों के लिए एक स्लैब-आधारित एमडीआर तय करना चाहिए, जबकि सूक्ष्म और छोटे व्यापारियों को पूरी तरह छूट मिलनी चाहिए। साथ ही ग्राहकों को किसी भी स्थिति में प्रत्यक्ष शुल्क से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि वित्तीय समावेशन प्रभावित ना हो।



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