भारत का विदेशी मुद्रा भंडार नए ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच गया है। गत दिनों समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढक़र 785.71 अरब डॉलर हो गया। एक ही सप्ताह में करीब 44.9 अरब डॉलर की यह बढ़ोतरी अपने आप में असाधारण है। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में लगभग 47.5 अरब डॉलर की वृद्धि ने इस रिकॉर्ड को सबसे अधिक सहारा दिया। इस उपलब्धि का सबसे बड़ा अर्थ भारत की बाहरी आर्थिक मजबूती से है। इतना बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक आर्थिक संकट, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, पूंजी के अचानक बाहर निकलने या रुपए पर दबाव जैसी परिस्थितियों में देश के लिए मजबूत सुरक्षा कवच का काम करता है। जरूरत पडऩे पर भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपए में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित कर सकता है। इससे आयात भुगतान की क्षमता बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है। पिछले पांच वर्षों में भी तस्वीर उल्लेखनीय रूप से बदली है। सितंबर, 2021 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 642.45 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। वहां से वर्तमान 785.71 अरब डॉलर तक पहुंचने का अर्थ है कि लगभग 143.26 अरब डॉलर, यानी करीब 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता और विदेशी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता को दर्शाता है। पर इस उपलब्धि का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हाल की तेजी का बड़ा हिस्सा विशेष विदेशी मुद्रा जुटाव योजनाओं और पूंजी प्रवाह से आया है। इन उपायों के कारण बैंकिंग प्रणाली में भारी मात्रा में अतिरिक्त तरलता भी आई है। रिपोर्टों के अनुसार बैंकिंग प्रणाली में अधिशेष नकदी 10 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गई है, जिसे नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक को कदम उठाने पड़ रहे हैं। क्या इससे महंगाई पर अंकुश लगेगा? सीधे तौर पर नहीं। मजबूत भंडार रुपए को स्थिर रखने और महंगे आयात, खासकर कच्चे तेल से पैदा होने वाली महंगाई को सीमित करने में मदद कर सकता है। लेकिन यदि विदेशी मुद्रा प्रवाह के साथ घरेलू अर्थव्यवस्था में अत्यधिक तरलता बनी रहती है, तो मांग बढऩे से महंगाई का दबाव उलटे बढ़ भी सकता है। इसलिए रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार निश्चित रूप से बड़ी आर्थिक ताकत है, लेकिन इसका लाभ तभी स्थायी होगा जब रिजर्व बैंक मुद्रा स्थिरता, तरलता और महंगाई—तीनों के बीच संतुलन साधे।

