ज्ञान, भक्ति और गुरुओं के प्रति आदर का उत्सव गुरु पूर्णिमा आज श्रद्धापूर्वक मनाई जाएगी। भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, विवेक और आत्मिक उन्नति का मार्गदर्शक माना गया है। गुरु, शिक्षक, माता-पिता और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त, ज्ञान, अनुशासन और आत्मचिंतन का सम्मान और आध्यात्मिक साधना और गुरु-शिष्य परंपरा को स्मरण करना ही इसके मनाने का प्रमुख उद्देश्य है। गुरु पूर्णिमा से ही 4 महीने का चातुर्मास शुरू होता है। इस दौरान साधु-संत एक जगह रुककर साधना करते हैं। गुरु पूर्णिमा इतिहास से जुड़ी कई परंपराएं भी हैं। इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा अनेक पुराणों का संपादन किया। इसलिए उन्हें आदि गुरु के रूप में भी सम्मान दिया जाता है। वहीं योग परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देकर आदि गुरु के रूप में प्रथम बार गुरु की भूमिका निभाई। बौद्ध धर्म में यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मान्यता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में इसी अवसर के आसपास दिया था। यह दिन याद दिलाता है कि जीवन में आगे बढऩे के लिए गुरु का मार्गदर्शन अमूल्य है। भारतीय परंपरा में गुरु को अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला माना गया है, इसलिए यह पर्व गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है।

