ईरान, अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू हुए करीब २१ दिन से ज्यादा हो गए हैं। पर अब भी इसके रूकने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही। एक तरफ ईरान युद्ध को विराम देना नहीं चाहता, वहीं दूसरी तरफ इजरायल और अमेरिका भी युद्ध को आगे बढ़ाने के लिए अडिग हैं। ऐसे में कई देशों के नागरिकों को हर तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई देशों की इकोनॉमी कमजोर होती जा रही है। संघर्ष के लंबे चलने से क्रूड ऑयल की कीमतें ११० डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची है, संभवतय: यह और चला तो कीमत १५० डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंचेगी। इससे भारत में महंगाई बढ़ेगी और रुपया कमजोर होगा। शेयर बाजार में भारी बिकवाली से निफ्टी/सेंसेक्स में गिरावट आ जाएगी। निवेशकों को पोर्टफोलियो में गिरावट और अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा, जिससे पोर्टफोलियो की वैल्यू घटेगी। होर्मुज जलडमरूमध्य के बाधित होने से तेल की आपूर्ति रुक सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भीषण उछाल आएगा। इससे भारत में परिवहन लागत बढऩे के कारण हर वस्तु महंगी हो जाएगी। तेल आयात बिल बढऩे से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटेगा, जिससे डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होगा। युद्ध की अनिश्चितता से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश डॉलर या सोना में शिफ्ट करेंगे, जिससे मार्केट में बड़ी गिरावट आ सकती है। वहीं इक्विटी म्यूचुअल फंड और शेयर की वैल्यू में भारी गिरावट भी आ जाएगी। डर के माहौल में निवेशक कम दाम पर अपने शेयर बेच सकते हैं, जिससे उन्हें नुकसान होगा। तेल की ऊंची कीमतों के कारण पेंट, टायर, एयरलाइन और पेंट्रोकेमिकल सेक्टर पर बुरा असर पड़ेगा। ऐसे में बड़े देशों को एकजुटता के साथ लंबे चलते युद्ध के विराम के लिए दबाव डालने का प्रयास करना चाहिए।

