भारतीय जन-जीवन में तेजी से घर करती डिजिटल जीवनशैली ने युवाओं की नींद को बुरी तरह प्रभावित किया है। जिसके चलते उनमें आक्रामकता, अवसाद व आत्महत्या की प्रवृत्ति विकसित हो रही है। देश-दुनिया में समय-समय पर आने वाले विभिन्न सर्वेक्षण इस संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। लेकिन देश में किशोरों का स्क्रीन टाइम घातक ढंग से बढ़ रहा है। आमतौर पर चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि किशोरों की सेहत के लिये आठ घंटे की नींद जरूरी होती है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ आठ घंटे के बजाय सात-छह घंटे की नींद को भी पर्याप्त मानते हैं, बशर्ते उसमें बीच में किसी तरह का व्यवधान न हो। लेकिन बिना किसी जरूरी काम के कथित सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना आज के दौर में फैशन सा बन गया है। अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों में हुए हालिया शोध बताते हैं कि रात में जल्दी सोने व सुबह जल्दी उठने से बेहतर स्वास्थ्य बनता है। यह भारतीय जीवन दर्शन की अपरिहार्य धारणा भी रही है। लेकिन देश में पहले टीवी और अब मोबाइल फोन के अनियंत्रित उपयोग ने युवाओं की रात की नींद उड़ा दी है। जिसके चलते युवा पूरे दिन उखड़े-उखड़े और अशांत रहते हैं। उनमें आक्रामकता बढ़ रही है। फिर वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। बाधित नींद की इस स्थिति में कालांतर मन में आत्महत्या जैसे नकारात्मक भाव उमडऩे लगते हैं।
एक सर्वे बताता है कि देश में 73 फीसदी दसवीं के छात्र आठ घंटे से कम की नींद सोते हैं। कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया में 60 से 70 फीसदी किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। दरअसल, आज छात्रों पर अभिभावकों व शिक्षकों का अनुशासन कम ही चलता है। मां-बाप के टोकने पर वे दलील देते हैं कि ऑनलाइन पढ़ाई चल रही है। कोरोना संकट ने देश-दुनिया में ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प तो दिया, लेकिन तमाम तरह की विसंगतियां व विकृतियां भी किशोरों के जीवन में भर दी हैं।
एक चौंकाने वाला आंकड़ा बताता है कि देश में सत्तर करोड़ भारतीय छह घंटे की नींद नहीं ले पाते। वहीं 46 प्रतिशत भारतीय छह घंटे से कम की नींद ले पाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा संकट युवाओं व किशोरों से जुड़ा है। वे देर रात तक ऑनलाइन गेमों से जुड़े रहते हैं। रात में जाने-अनजाने दोस्त उनके सहभागी बनते हैं। जो कालांतर एक नशे की लत का रूप ले लेता है। परिजनों की रोक-टोक उन्हें रास नहीं आती। कई घटनाओं में उनके आक्रामक व्यवहार के घातक परिणाम सामने आए हैं। यहां तक कि नजदीकी परिजनों की हत्या की घटनाएं भी हुई हैं। दरअसल, ऑनलाइन खेलों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे किशोरों के लिये नशा बन जाते हैं। रात का एकांत उन्हें रास आता है। जिसके चलते वे नींद की परवाह नहीं करते




