इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (क्यू1एफवाई26) और जून 2025 के भारत के व्यापार संबंधी आंकड़े कुछ हद तक खुशी की गुंजाइश दे रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही काफी चिंताएं भी हैं। वाणिज्य मंत्रालय के मासिक निर्यात-आयात संबंधी आंकड़ों से संकेत मिलता है कि जून के माल व्यापार में 14 महीनों में अमेरिका के लिए भेजे जाने वाले खेपों (आउटबाउंड शिपमेंट) में सबसे तेज उछाल देखा गया, जो कि 23.5 फीसदी की वृद्धि दर से 8.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो गया।
जून में वस्तुओं का कुल निर्यात लगभग 35.14 बिलियन अमेरिकी डॉलर (पिछले जून में 35.16 बिलियन अमेरिकी डॉलर) पर स्थिर रहा। ऐसा शायद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी की वजह से हुआ और क्यू1एफवाई26 के दौरान निर्यात साल-दर-साल के आधार पर 1.92 फीसदी की मामूली वृद्धि के साथ 112.17 बिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा। साल-दर-साल के आधार पर बढ़ते हुए माल व्यापार घाटे के 67.26 बिलियन अमेरिकी डॉलर (वित्तीय वर्ष 2025 की पहली तिमाही में 62.1 बिलियन डॉलर) के आंकड़े तक पहुंच जाने के बावजूद, सेवाओं के निर्यात में लगभग 11 फीसदी की प्रभावशाली वृद्धि हुई और यह 98.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर (वित्तीय वर्ष 2025 की पहली तिमाही में 88.46 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का रहा। सेवाओं के निर्यात ने वित्तीय वर्ष 2026 की पहली तिमाही में भारत के समग्र व्यापार घाटे को 9.4 फीसदी तक कम करने में मदद की है। यह भारत के उन व्यापारिक रुझानों को दर्शाता है, जहां सेवाओं के निर्यात ने वस्तुओं के निर्यात के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद पारंपरिक रूप से भारत के माल निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 15 फीसदी) रहे हैं। भारत हाल ही में चीन को पीछे छोडक़र रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक बन गया है, जो उसके तेल आयात का 36 फीसदी है। इससे भारत को लागत अंतरण (कॉस्ट आर्बिट्रेज) का लाभ उठाने में मदद मिली है, क्योंकि पश्चिमी यूरोपीय देश रूसी कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध बनाए हुए हैं।

