पांच अगस्त को शेख हसीना के बंगलादेश से भाग कर भारत आने के बाद से वहां हालात बेकाबू बने हुए हैं। देश में चल रहे लगातार चल रहे घटनाक्रम बता रहे हैं कि वहां स्थिति कितनी गम्भीर है। बंगलादेश की हिंसा में हिन्दुओं पर हमले की 200 से ज्यादा घटनाएं हुई हैं, जिनमें अनेक लोगों को प्राण गंवाने पड़े हैं तथा अंतरिम सरकार के प्रधान मोहम्मद यूनुस अल्पसंख्यक समुदाय को विश्वास में लेने के लिए हिंदू धर्मस्थलों में जाने के अलावा अल्पसंख्यक नेताओं के साथ बातचीत भी कर रहे हैं। इस तरह के हालात के बीच भारत सरकार द्वारा बंगलादेश के साथ लगती भू-सीमा को खोलने तथा बंगलादेशी हिन्दुओं को भारत में शरण देने के मामले में भाजपा समर्थकों ने सरकार से पूछा है कि पिछले एक सप्ताह से बंगलादेश में हिन्दुओं पर लगातार बढ़ रहे अत्याचारों के प्रमाण सामने आने के बावजूद हिन्दुओं को भारत आने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है? जानकारी यह भी मिली है कि 9 अगस्त को बी.एस.एफ. ने 1700 बंगलादेशी हिन्दुओं के भारत में दाखिल होने के प्रयास को नाकाम कर दिया था। पहले भी अफगानिस्तान के संकट के समय सरकार ने उचित रूप से सिखों को शरण दी थी, परंतु अब बंगलादेश के हिन्दुओं के साथ भारत सरकार भेदभाव क्यों कर रही है? अतीत में भारत सरकार यहूदियों तथा पारसियों तक को शरण दे चुकी है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगलादेश की अंतरिम सरकार के प्रधान मोहम्मद यूनुस को बधाई संदेश देते हुए उनके नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को इस बात के लिए प्रभावित करने की कोशिश की है कि बंगलादेश में हिन्दुओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने की जरूरत है। इस समय बंगलादेश का संकट भारत सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती है जिसे सुलझाना आसान नहीं। बताया जाता है कि असम और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री सीमाएं खोलने के पक्ष में नहीं हैं। पिछले एक सप्ताह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता इस जटिल समस्या पर भारत सरकार से चर्चा कर रहे हैं तथा विश्व हिन्दू परिषद के एक शिष्टमंडल ने पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह से भेंट करके उन्हें बंगलादेशी हिन्दुओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने की मांग भी की है। केंद्र सरकार को उत्पीडि़त अल्पसंख्यकों को अन्य प्रवासियों से अलग करने का कोई उपाय करना चाहिए। केंद्र सरकार को प्राथमिकता के आधार पर विचार करके शीघ्र कोई प्रभावशाली निर्णय लेना चाहिए।

