ग्लोबल सप्लाई चेन में निरंतर बदलाव आ रहा है। इसका फायदा कई एशियाई देशों को मिलने वाला है। जहां दुनिया की दिग्गज कंपनियां ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए चीन का विकल्प तलाश रही हैं। इसका जहां बड़ा फायदा भारत को मिलता नजर आ रहा है। पिछले दिनों जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्लोबल कंपनियां सप्लाई चेन के लिए चीन के बाहर दूसरे देशों में अवसर तलाश रही हैं। एशिया में भारत को अच्छा फायदा होने की उम्मीद है। इसके बाद वियतनाम और मलेशिया की आती है। भारत का एक्सपोर्ट्स 2030 तक 835 बिलियन डॉलर तक होने की संभावना है, जो 2023 में 431 बिलियन डॉलर रहा था। जहां भारत के लिए सबसे ज्यादा अवसर पैदा होने वाला है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, कैपिटल गुड्स, सेमीकंडक्टर (एसेंबलिंग, टेस्टिंग), एनर्जी (सोलर) के अलावा फार्मास्युटिकल्स शामिल है। जहां ग्लोबल वैल्यू चेन में चीन की भूमिका में बदलाव हो रहा है। चीन सबसे बड़ा निवेशक है और उसके ज्यादातर निवेश आसियान में केंद्रित है, जबकि भारत में निवेश अमेरिका के अलावा विकसित एशियाई देशों से आ रहा है। भारत जरूरी इकोसिस्टम को तैयार कर अपने ठंडे पड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जान फूंकने में जुटा है जिसके लिए सरकार द्वारा शुरू किए गए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव स्कीम बहुत मायने रखता है। भारत सीधे सर्विसेज सेक्टर के नेतृत्व वाले ग्रोथ को लेकर आगे बढ़ रहा है। वहीं मैन्युफैक्चरिंग पर दिए जा रहे नीतिगत जोर और सप्लाई चेन के रिअलोकेशन देश के आर्थिक विकास को गति दे सकता है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर्स सेक्टर्स जिसमें दुनिया की दिग्गज कंपनियां मौजूद है उस सेक्टर में प्रगति देखी जा रही है। ईवी के क्षेत्र में भारत की ऑटोमोबाइल सेक्टर फायदा उठाना चाहती है। वैसे भारत पहले से ही ऑटो मैन्युफैक्चरिंग हब है। सोलर एनर्जी आने वाले दशक में दूसरे सभी एनर्जी के सोर्स को कैपेसिटी के मामले में पीछे छोड़ देगा। फार्मा सेक्टर में कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भरता घटाने के लिए भारत में मैन्युफैक्चरिंग को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। डिफेंस और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन जिसमें आत्मनिर्भर भारत के तहत इंपोर्ट की जगह घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है और इसमें निजी क्षेत्र की भी भागीदारी है।

