वैश्विक व्यापार व्यवस्था के सामने अब समुद्री चोकपॉइंट्स बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य का उपयोग रणनीतिक दबाव और राजस्व कमाने के साधन के रूप में किए जाने के बाद अब इंडोनेशिया भी मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाने जैसे कदमों पर विचार कर रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं बढ़ गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले जिन महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित और निष्पक्ष माना जाता था, अब उन्हें आर्थिक और राजनीतिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। कई देश इन मार्गों को नियंत्रित करने, उन पर शुल्क लगाने और रणनीतिक लाभ लेने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे वैश्विक व्यापार की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य सबसे बड़ी ऊर्जा संवेदनशीलता बनकर उभरा है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत और एलपीजी व एलएनजी आयात का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज़ मार्ग पर बढ़ते खतरे के कारण भारत ने अपने लगभग 70 प्रतिशत कच्चे तेल आयात को वैकल्पिक और लंबे समुद्री मार्गों की ओर मोड़ना शुरू कर दिया है। इसमें आर्कटिक, बाल्टिक, पश्चिम अफ्रीका और रूस से आने वाला कच्चा तेल शामिल है। हालांकि, लंबे समय तक यह व्यवस्था आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं मानी जा रही। मलक्का जलडमरूमध्य भी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत का एक-तिहाई से अधिक वैश्विक व्यापार, विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ होने वाला व्यापार, इसी मार्ग से होकर गुजरता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि होर्मुज़ भारत की ऊर्जा जीवनरेखा है तो मलक्का उसका व्यापारिक धमनियों जैसा महत्व रखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज़ और मलक्का जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर कर या नियामक नियंत्रण बढ़ता है तो इसका असर केवल परिवहन लागत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। व्यापारिक लागत बढ़ने के साथ-साथ भारत को उन राजनीतिक निर्णयों के प्रति भी अधिक संवेदनशील होना पड़ेगा जो उसके नियंत्रण से बाहर हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने इस जोखिम को कम करने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। देश में बंदरगाह अवसंरचना का विस्तार किया जा रहा है, घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई जा रही है और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार करने पर भी काम तेज हुआ है। ये सभी कदम भविष्य में आपूर्ति संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का विकास तथा ग्रेट निकोबार में ट्रांस-शिपमेंट हब बनाने का प्रस्ताव भी भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण ये क्षेत्र समुद्री गतिविधियों की निगरानी और भारत की रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत पश्चिमी देशों, रूस और अफ्रीकी देशों से अधिक तेल आयात करके संवेदनशील समुद्री मार्गों पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इसके साथ ही भारत को सड़क, रेल और बहु-माध्यम परिवहन गलियारों के विकास पर भी अधिक निवेश करना चाहिए ताकि व्यापारिक विकल्पों का विस्तार हो सके। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को सबसे स्थायी समाधान माना गया है। परिवहन क्षेत्र में विद्युतीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता के विस्तार से भारत की समुद्री मार्गों पर निर्भरता घट सकती है। इससे बाहरी जोखिम कम होंगे और घरेलू ऊर्जा क्षमता मजबूत होगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि भारत अपने रणनीतिक भंडार और सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करता है तो वह बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव का बेहतर सामना कर सकेगा, भले ही समुद्री परिवहन बाधाओं को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव न हो। विशेषज्ञों के अनुसार, इंडोनेशिया की ओर से मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर उठाए गए संकेत भले ही तुरंत नीति में न बदलें, लेकिन उन्होंने भारत समेत कई देशों के सामने नया रणनीतिक जोखिम खड़ा कर दिया है। भारत को अब ऊर्जा नीति, समुद्री रणनीति, आर्थिक योजना और भू-राजनीतिक आकलन को एकीकृत दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता होगी।

