बिजऩेस रमेडीज/सोलन हिमालयी औषधीय पौधे, जिन्हें पीढिय़ों से आदिवासी समुदाय पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग करते आए हैं, अब वैज्ञानिक रूप से उनके स्वास्थ्य लाभों के लिए प्रमाणित किए जा रहे हैं। इन पौधों के औषधीय महत्व को Asthma, Fever, Jaundice, शारीरिक दर्द, श्वसन संबंधी समस्याओं और संक्रमण जैसी स्थितियों के प्रबंधन में कारगर पाया गया है।
Shoolini University के स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज की सहायक प्रोफेसर एवं हर्बेरियम व ड्रग म्यूजय़िम की प्रभारी डॉ. राधा के व्यापक शोध से पता चला है कि इनमें से कई पौधे एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रो बियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर और यकृत संरक्षण गुणों से भरपूर हैं। वर्ष 2025 में उन्होंने चार पेटेंट दर्ज कराए हैं, जो पारंपरिक ज्ञान को फंक्शनल फूड्स और प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल उत्पादों में बदलने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है। अध्ययन किए गए पौधों में सेमलके फूल विशेष रूप से आशाजनक पाए गए हैं। पारंपरिक रूप से इनके शीतल और पुनर्स्थापनात्मक गुणों को महत्व दिया जाता रहा है। वैज्ञानिक परीक्षणों में यह फूल आहार फाइबर, फिनॉल्स और फ्लेवोनॉयड्स से भरपूर पाया गया है, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधियों में सहायक हैं तथा पोषण की कमी को दूर करने में मददगार हैं। इसी आधार पर डॉ. राधा ने सेमल के फूल और सेब से बना पोषक तत्वों से युक्त जैम तथा एक रेडी-टू-सर्व ड्रिंक तैयार की है, जिसमें सभी सक्रिय यौगिक (बायोएक्टिव कम्पाउंड्स) सुरक्षित रहते हैं। इन दोनों उत्पादों में कृत्रिम संरक्षक या रंग का प्रयोग नहीं किया गया है। वैज्ञानिक समीक्षाओं ने इस फूल में एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर, एंटीमाइक्र्रोबियल और यकृत-संरक्षण की क्षमता को भी रेखांकित किया है। प्रयोगशाला अध्ययनों में दो अन्य हिमालयी पौधों ने भी मजबूत एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि दिखाई। प्रिंसेपिया यूटिलिस (हिमालयी चेरी), जिसका भारतीय और चीनी पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से उपयोग होता रहा है, फिनोलिक एसिड, फ्लेवोनॉयड्स और ट्राइटर-पेनॉयड्स से भरपूर पाया गया। डॉ. राधा ने कहा कि हिमालय की जनजातियाँ पारिस्थितिक ज्ञान का जीवित भंडार हैं। अस्थमा, पीलिया, बुखार और संक्रमण के लिए उनकी कई पारंपरिक औषधियाँ अब प्रयोगशाला में औषधीय क्षमता के साथ प्रमाणित हो चुकी हैं। हमारा लक्ष्य इस पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक साक्ष्यों से जोडऩा है ताकि यह निवारक स्वास्थ्य देखभाल में योगदान दे सके और जैव-विविधता की रक्षा भी सुनिश्चित हो। इन खोजों से आगे बढ़ते हुए, डॉ. राधा के एथ्नोबॉटनिकल सर्वेक्षण में 1,600 से अधिक हिमालयी पौधों का दस्तावेजीकरण किया गया है, जिनमें से कई का फाइटोकेमिकल और औषधीय विश्लेषण किया गया।

