नई दिल्ली,
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की 3-दिवसीय बैठक आज से शुरू हो गई है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच इस बैठक पर वित्तीय बाजारों और अर्थव्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों की खास नजर बनी हुई है। बैठक के बाद नीतिगत निर्णय शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा द्वारा घोषित किया जाएगा।
अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा और वर्तमान स्थिति को बरकरार रख सकता है। हालांकि, बाहरी जोखिमों और वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए केंद्रीय बैंक का रुख पहले की तुलना में अधिक सतर्क रहने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। इसका सीधा प्रभाव महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी किए जाने वाले नए आर्थिक अनुमान निवेशकों और उद्योग जगत के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
एचएसबीसी की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार निकट भविष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों को स्थिर रख सकता है। हालांकि आने वाले समय में नीतिगत रुख धीरे-धीरे सख्त हो सकता है। बाजार फिलहाल वर्ष 2026 की चौथी तिमाही से लगभग दो बार ब्याज दरों में कटौती की संभावना को शामिल कर रहे हैं। विशेषज्ञों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक के संशोधित आर्थिक अनुमानों पर भी रहेगी। माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक कच्चे तेल की कीमतों के अपने पूर्व अनुमान में बदलाव कर सकता है। यदि ऊर्जा कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो महंगाई का अनुमान भी बढ़ सकता है।
प्रांजुल भंडारी के अनुसार यदि ऊर्जा लागत में लगातार वृद्धि जारी रहती है तो महंगाई का अनुमान पहले के 4.6प्रतिशत से बढ़कर लगभग 5प्रतिशत के करीब पहुंच सकता है। इससे भविष्य की मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है। केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका और खुदरा ईंधन कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के कारण महंगाई संबंधी दबाव बढ़े हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि थोक स्तर पर बढ़ती कीमतों का असर धीरे-धीरे खुदरा महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान महंगाई मुख्य रूप से आपूर्ति संबंधी कारणों से बढ़ रही है, जबकि मांग आधारित दबाव अभी सीमित हैं। संस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, बशर्ते कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 90 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहे। हालांकि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है और कच्चे तेल की कीमतें 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच जाती हैं, तो आर्थिक वृद्धि दर घटकर लगभग 6प्रतिशत तक आ सकती है।
इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक की शोध इकाई ने भी अनुमान लगाया है कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बैठक में रेपो दर को यथावत रख सकता है। रिपोर्ट के अनुसार महंगाई से जुड़े जोखिम और वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए केंद्रीय बैंक आंकड़ों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाएगा। शोध रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह लगभग 7.5 प्रतिशत रह सकती है। वहीं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई कई तिमाहियों तक 5प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज ने भी ब्याज दरों में किसी बदलाव की संभावना नहीं जताई है। संस्था के अनुसार हाल के समय में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी और बाहरी क्षेत्र की स्थिति में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट आती है तथा भू-राजनीतिक तनाव कम होता है, तो भारतीय मुद्रा को मजबूती मिल सकती है। साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक को लंबे समय तक ब्याज दरों को स्थिर रखने में भी सहायता मिलेगी।

