बिजऩेस रेमेडीज/जयपुर Asthma सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए रोज़ की लड़ाई है, सांस लेने की लड़ाई। जब हर सांस भारी लगे, जब सीने में जकडऩ हो, रात की नींद खांसी से टूट जाए तब समझ आता है कि सामान्य सी दिखने वाली ये बीमारी, कितनी असामान्य तकलीफ दे सकती है।
Narayana Hospital , Jaipur के श्वसन एवं फेफड़ों के रोग विशेषज्ञ, डॉ. शुभम शर्मा का कहना है कि अस्थमा के शुरुआती लक्षणों को पहचानना और उनका सही इलाज आवश्यक है। भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां अस्थमा के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। यहां करीब 3 करोड़ से ज्यादा लोग अस्थमा से प्रभावित हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या गंभीर अस्थमा से जूझ रही है, ऐसा अस्थमा जो सामान्य दवाओं से कंट्रोल नहीं होता और बार-बार अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ता है। यह न केवल व्यक्ति की शारीरिक क्षमता बल्कि उसकी मानसिक स्थिति और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर डालता है। गंभीर अस्थमा के कई कारणों में अनुवांशिकता अगर परिवार में अस्थमा या एलर्जी की हिस्ट्री है। इसके अलावा पर्यावरणीय कारण जैसे वायु प्रदूषण, परागकण, धूल-मिट्टी, धुएं और केमिकल्स, जीवनशैली, धूम्रपान, मोटापा, तनाव और खराब नींद आदि हो सकते हैं।
अधूरा या गलत इलाज: समय पर जांच न करवाना या दवाओं को लेकर लापरवाही। इन सब कारणों के बीच, एक बात साफ है कि अगर पहचान और इलाज सही समय पर हो जाए, तो इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।अस्थमा की जांच कोई महंगी या जटिल प्रक्रिया नहीं है।पीएफटी एक सामान्य, किफायती और बिना दर्द की जांच है जो अब ज़्यादातर अस्पतालों और ओपीडी में ही हो रही है। यह जांच बताती है कि आपके फेफड़े कितनी ऑक्सीजन ले और छोड़ रहे हैं। इससे न केवल अस्थमा की पुष्टि होती है बल्कि उसकी गंभीरता का भी अंदाज़ा लगता है।
इन्हेलर को लेकर फैले मिथक : ज़रूरत है सोच बदलने की आज भी हमारे समाज में इन्हेलर को लेकर कई गलत धारणाएं हैं जैसे इन्हेलर की आदत लग जाती है।ये अंतिम स्टेज पर इस्तेमाल होते हैं।इससे कमजोरी आती है इत्यादि।
Narayana Hospital , Jaipur के श्वसन एवं फेफड़ों के रोग विशेषज्ञ, डॉ. शुभम शर्मा का कहना है कि इन्हेलर जीवन बचाते हैं। इनसे दवा सीधे फेफड़ों तक जाती है, जो टैबलेट या सिरप से कहीं ज़्यादा असरदार है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इसे अस्थमा का सबसे प्रभावी इलाज मानते हैं। बच्चों में अस्थमा को लेकर माता-पिता अक्सर डर जाते हैं। लेकिन अगर बचपन में ही सही इलाज शुरू हो जाए, तो बच्चों का अस्थमा बड़े होते-होते पूरी तरह ठीक भी हो सकता है। इसलिए यदि आपका बच्चा बार-बार खांसता है, दौडऩे पर सांस फूलती है या रात में सांस में सीटी जैसी आवाज़ आती है तो समय पर जांच जरूर करवाएं।

