बिजऩेस रेमेडीज/नई दिल्ली भारत की सबसे बड़ी डिजिटल स्वास्थ्य सेवा कंपनी, MediBuddy ने CII के सहयोग से आज अपनी कॉर्पोरेट स्वास्थ्य रिपोर्ट का दूसरा संस्करण जारी किया, जो भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र में कर्मचारी कल्याण के बदलते परिदृश्य को समझने की दिशा में सतत प्रयास को रेखांकित करता है। नवीनतम संस्करण, जिसका शीर्षक है ‘कार्यस्थल पर स्वास्थ्य का नया रूप: कॉर्पोरेट भारत की डिजिटल स्वास्थ्य नेतृत्व के लिए तैयारी’ (वर्कप्लेस हेल्थ रिइमैजिन्ड: कॉर्पोरेट इंडियाज रेडीनेस फॉर डिजिटल हेल्थ लीडरशिप), यह दर्शाता है कि कर्मचारी कल्याण अब एक सामान्य पहल नहीं, बल्कि कार्यबल उत्पादकता, कर्मचारियों को कंपनी में बनाए रखने और व्यवसाय की निरंतरता के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बन रहा है।
भारत का स्वास्थ्य और कार्यस्थल वेलनेस क्षेत्र बड़े बदलाव से गुजर रहा है, जिसमें वेलनेस ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में राष्ट्रीय प्राथमिकता बन रहा है। ऐसा बढ़ती चिकित्सा मुद्रास्फीति (14 प्रतिशत), पुरानी बीमारियों के बढ़ते जोखिम, डिजिटल रूप से सशक्त कार्यबल, और समावेशी व निवारक देखभाल मॉडल की बढ़ती मांग के मद्देनजर हो रहा है। महामारी के बाद के दौर में जहां काम करने के हाइब्रिड मॉडल आम हो गए हैं, संगठन वेलनेस पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बराबर महत्व दे रहे हैं, और कभी-कभार की देखभाल से हमेशा सक्रिय मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। यह बदलाव प्रौद्योगिकी आधारित है; एआई-आधारित जानकारी, डेटा आधारित वैयक्तिकरण, और मोबाइल आधारित प्लेटफॉर्म अधिक प्रभावी देखभाल प्रदान कर रहे हैं। देश का डिजिटल स्वास्थ्य ढांचा उल्लेखनीय स्तर पर है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और आईआरडीएआई के 100 प्रतिशत कैशलेस बीमा दावों पर जोर जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलें डिजिटल रूप से एकीकृत, ओपीडी-प्रधान स्वास्थ्य प्रणालियों को अपनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे रही हैं। डिजिटल ढांचा और बीमा मिलकर भारत में समान और भविष्य के लिए तैयार वेलनेस प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुख्य अंश :
1. गैर संक्रामक रोगों का बढ़ता बोझ : भारत में अब कुल मौतों में 63 प्रतिशत भागीदारी गैर-संक्रामक रोगों की है, जिनमें हृदय रोग, डायबिटीज और स्ट्रोक क्रमश: 32, 34 और 36 वर्ष की औसत आयु के कार्यबल को प्रभावित कर रहे हैं।
2. स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे का संकट : डॉक्टर और जनसंख्या का अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश के स्तर से नीचे बना हुआ है, देश के ग्रामीण/अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 70 प्रतिशत लोगों को निदान और नियमित देखभाल हासिल करने में भारी बाधा का सामना करना पड़ रहा है।
3. स्वास्थ्य सेवा कवरेज का संकट : भारत में केवल 41 प्रतिशत घरों के पास किसी न किसी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा है। इसके चलते 50 करोड़ से अधिक लोग, जिनमें मुख्य रूप से देश की 40 करोड़ की ‘मिसिंग मिडल’ आबादी शामिल है, जिसमें गिग वर्कर, दैनिक मज़दूर और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी प्रमुख हैं, विनाशकारी स्वास्थ्य व्ययों के प्रति असुरक्षित बने हुए हैं।
4. ओपीडी बीमा की कम पहुंच : भारत में ओपीडी बीमा पहुंच 0.1 प्रतिशत से कम बनी हुई है, जो अमेरिका के 85 प्रतिशत और सिंगापुर के 95 प्रतिशत से अधिक के स्तर की तुलना में काफी कम है। इससे ज्यादातर बाहरी इलाज का खर्च कवर नहीं होता, भले ही ओपीडी निजी स्वास्थ्य खर्च का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा हो।
MediBuddy के सह-संस्थापक और सीईओ, सतीश कन्नन ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में भारत की यात्रा केवल आर्थिक पैमानों पर निर्भर नहीं कर सकती बल्कि इसे अपने लोगों के स्वास्थ्य, उत्पादकता और कल्याण (वेलबीइंग) पर आधारित होना चाहिए। हम ऐसे मुकाम पर हैं, जहां कर्मचारी की तंदुरुस्ती को अब वैकल्पिक लाभ नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे एक रणनीतिक अनिवार्यता माना जाना चाहिए। बढ़ते स्वास्थ्य जोखिमों और कर्मचारियों की बदलती अपेक्षाओं के साथ, सीआईआई के सहयोग से तैयार यह रिपोर्ट उपयोगी सुझाव और डेटा-आधारित ढांचे प्रदान करती है, जो संगठनों को सालाना स्वास्थ्य शिविरों से हमेशा सक्रिय, डिजिटल-प्रधान प्रणालियों की ओर बढऩे में मदद करती है। MediBuddy में, हमें सक्रिय, व्यक्तिगत और टेक्नोलॉजी आधारित देखभाल प्रदान कर इस बदलाव का समर्थन करने में खुशी हो रही है।

