ईरान-इजरायल व अमेरिका युद्ध को चलते हुए करीब 27 दिन से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक यह रूकने का नाम नहीं ले रहा है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इससे गड़बड़ा गई है। निवेशकों में भी चिंता व्याप्त हो रही है कि कहीं उनके पैसे डूब नहीं जाएं। वहीं भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि, मुद्रास्फीति और विकास दर में 4 फीसदी तक की कमी की आशंका है। इससे व्यापक प्रभाव पडऩे की पूरी संभावना है। कच्चे तेल के आयात पर 85 फीसदी निर्भरता के कारण युद्ध से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ जाएगी, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा। वहीं ईंधन की कीमतों में वृद्धि से परिवहन और आवश्यक वस्तुओं की दरें बढ़ेंगी, जिससे महंगाई बढ़ेगी। डॉलर की मजबूती और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रुपए की कीमत में गिरावट आ जाएगी, जो पहले ही तीन फीसदी गिर चुका है। यदि युद्ध और लंबा चलता है, तो आर्थिक विकास दर पर काफी असर पड़ेगा। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के रुकने से तेल, गैस और उर्वरक की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है। बाजार की अनिश्चितता के कारण शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भारत को इन सभी बातों को ध्यान में रखकर मौजूद तेल भंडारों का उपयोग कर 60-65 दिनों तक ईंधन आपूर्ति बनाए रखना बेहद जरूरी है। युद्ध को रोकने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाए रखना है। इसके अलावा तेल और गैस की आपूर्ति के लिए ईरान के अलावा अन्य देशों रूस, खाड़ी देशों पर निर्भरता बढ़ाना है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से तेल आपूर्ति के लिए 7 सशक्त समूह बनाकर स्थिति पर लगातार नजर रखना है। आरबीआई की ओर से मौद्रिक नीतियों में समायोजन करना जरूरी है ताकि बाहरी दबावों का असर कम हो सके।

