मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण पिछले काफी दिनों से डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड लो पर है। मार्च-अप्रैल में ही 4 फीसदी गिरा है। रुपया कमजोर होने से भारत के लिए कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य सामानों का आयात महंगा हो गया है, जिससे घरेलू स्तर पर महंगाई बढऩे का सीधा खतरा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 80-90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने और डॉलर की मांग बढऩे से भारत का व्यापार घाटा और बढ़ सकता है। तनाव के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालने से रुपए पर और दबाव बढ़ा है। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता के कारण निवेशक डॉलर को सुरक्षित निवेश मानकर उसकी ओर भाग रहे हैं, जिससे अन्य मुद्राओं के साथ रुपया भी कमजोर हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष के अंत तक रुपया 95 रुपए प्रति डॉलर के आसपास ही बना रह सकता है। स्थिरता तभी संभव है जब मिडिल ईस्ट का तनाव कम हो और कच्चे तेल की कीमतें नीचे आएं। भारतीय रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है, जो रुपए को अत्यधिक गिरने से बचाने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष जारी रहता है, तो इस वर्ष रुपए में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इससे तेल आयात महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका असर परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ेगा। आयातित महंगाई के कारण खाने-पीने से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं, जिससे आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। डॉलर महंगा होने से विदेश में पढऩे वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों का खर्च बढ़ेगा। कमजोर रुपए से आईटी और टेक्सटाइल जैसे निर्यातकों को लाभ हो सकता है, लेकिन अगर कच्चे माल का आयात महंगा होगा, तो यह लाभ भी सीमित हो जाएगा। वहीं स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। जहां एफआईआई की बिकवाली से शेयर बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। फिलहाल मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण रुपया दबाव में है।

