New Delhi,
वैश्विक अनिश्चितताओं और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी रहने की संभावना है। एस एंड पी ग्लोबल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है। मजबूत घरेलू मांग, स्थिर निर्यात और निजी निवेश में धीरे-धीरे सुधार इस वृद्धि को सहारा दे रहे हैं।
घरेलू मांग और निवेश से मिल रहा समर्थन
एस एंड पी ग्लोबल के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था में उपभोग का स्तर लगातार मजबूत बना हुआ है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बल मिल रहा है। साथ ही, निवेश गतिविधियों में सुधार भी देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में विकास को और गति देगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाहरी चुनौतियों जैसे व्यापार अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की आंतरिक मजबूती इन प्रभावों को काफी हद तक संतुलित कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी वृद्धि बनी हुई है और भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहा है। चीन को छोड़कर इस क्षेत्र की वृद्धि दर वर्ष 2026 में बढ़कर 4.5 प्रतिशत रहने की संभावना है। तकनीकी क्षेत्र से जुड़े उद्योगों में मजबूत प्रदर्शन इस वृद्धि को सहारा दे रहा है।
चीन की वृद्धि में सुस्ती का अनुमान
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि चीन की अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ सकती है। वर्ष 2026 में चीन की जीडीपी वृद्धि दर 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कमजोर मांग, रियल एस्टेट क्षेत्र की चुनौतियां और बाहरी अनिश्चितताएं इसकी मुख्य वजह हैं। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की ऊंची कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं, लेकिन भारत के लिए सेवा क्षेत्र का मजबूत निर्यात और विविध आर्थिक ढांचा इन प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है।
मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर संतुलित रुख
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों को स्थिर बनाए रखने की संभावना है, ताकि आर्थिक वृद्धि को समर्थन मिल सके और मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहे। वित्त वर्ष 2026-27 में मुद्रास्फीति दर 4.3 प्रतिशत तक सामान्य होने का अनुमान है, जो संतुलित स्तर पर मानी जा रही है, भले ही वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अर्धचालक जैसे तकनीकी क्षेत्रों से जुड़े निर्यात की मांग मजबूत बनी हुई है। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत, को व्यापार में बढ़त मिल रही है।

