भारत में बढ़ते वाहन और कटते पेड़ों की वजह से पर्यावरण संतुलन दिनों दिन गड़बड़ाता जा रहा है। इसके चलते स्वच्छ हवा नहीं मिल पा रही है। ऐसे में प्रदूषण को कम करने की महत्ती आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण आज की जरूरत है। प्रदूषण को विभिन्न तरीकों से कम किया जाता है। इसके लिए उद्योगों के चारों तरफ, घनी बस्तियों, सडक़ों के किनारे, खाली बन्जर भूमि, खेतों की मेड एवं सार्वजनिक स्थानों पर वृक्ष लगाएं तथा वनों का विनाश रोकें। सभी जीव जन्तुओं की सुरक्षा और संरक्षण को बढ़ावा दें। स्वस्थ एवं सुखी जीवन के लिए जनसंख्या पर नियंत्रण रखें। उद्योगों आदि से निकलने वाले प्रदूषित जल उत्सर्जन को निर्धारित मानकों के अनुरूप नदी, नाले, भूमि व वायुमंडल आदि में निस्तारण करें। नए उद्योगों की स्थापना, बस्तियों के निर्माण एवं विकास कार्यों के पूर्व भी पर्यावरण पहलुओं का समावेश किया जाए। नदी एवं अन्य जल स्रोतों में बिना जले एवं अधजले शवों को प्रवाहित ना किया जाए, इससे प्रदूषण बढ़ता है। इसके लिए विद्युत शवदाह गृह का उपयोग करें। स्वच्छ प्रोद्यौगिकी को अपनाकर उद्योगों व अन्य स्रोतों से जनित कूडे कचरे व फ्लाई ऐश का पुन: प्रयोग करके बायोगैस, ऊर्जा, खाद, बिजली, भवन निर्माण सामग्री व अन्य उत्पादों के निर्माण में करें। कूडे-करकट को इधर-उधर ना फेंककर इसका निस्तारण समुचित निर्धारित स्थल पर ही करें। परिवहन चालक अपने वाहनों का रखरखाव उचित प्रकार से करें तथा समय-समय पर वाहनों के कारबोरेटर एवं उत्सर्जन की जांच कराते रहें। स्वेच्छा से कम से कम शोर उत्पन्न कर ध्वनि प्रदूषण रोकने में सहयोग करें। इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खादों, बर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, जैविक कल्चर, कम्पोस्ट खाद एवं फलीदार फसलों को अपनाएं। अगर समय रहते सरकार और आम जनता ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया तो प्रदूषण की समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। ऐसे में लोगों में अस्थमा, कैंसर और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ेंगी। भूजल स्तर बहुत नीचे चला जाएगा और साफ पानी मिलना बंद हो जाएगा। अत्यधिक गर्मी, सूखा, और बेमौसम बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ेंगी। मिट्टी खराब होने और पानी की कमी के कारण फसलें नहीं उगेंगी, जिससे खाने का भारी संकट पैदा हो जाएगा।

