पिछले काफी समय से टैरिफ युद्ध छिड़ जाने से अमेरिका-चीन के मध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार 80 फीसदी तक कम होने की संभावना है। इसके अलावा अन्य देशों के निर्यातक भी वहां माल भेजने से कतरा रहे हैं। इन स्थितियों में भारत के लिए एक बड़ा अवसर बना हुआ है। जहां एक ओर चीन और अमेरिका के बीच टैरिफ जंग तेज होती जा रही है। दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते करीब-करीब समाप्त होते दिख रहे हैं। एक-दूसरे पर अमेरिका और चीन ने बेहद ऊंचे टैक्स लगा दिए हैं। इसके बाद दोनों देशों के लिए अपने उत्पादों को एक-दूसरे के यहां बेच पाना मुश्किलभरा होता जा रहा है। ट्रंप ने चीन से दूरी बनाने की अपनी मंशा साफ कर दी है। वहीं उन्होंने दूसरे देशों पर लागू टैरिफ को 90 दिनों के लिए रोक दिया है। वहीं, चीन को इस राहत से बाहर रखा गया है। ऐसी स्थिति में भारत एक संभावित विकल्प के रूप में उभर सकता है। विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में। अमेरिकी बाजार में चीनी वस्तुओं पर बढ़ा टैरिफ लगने से भारतीय निर्यातकों के लिए जगह बन सकती है। यह उनके उत्पादों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाएगा। इसके अलावा जो कंपनियां चीन से बाहर निकलना चाहती हैं, वे भारत को आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में देख सकती हैं। खासकर अगर भारत अपने कारोबारी माहौल और बुनियादी ढांचे में सुधार करता है। भारत का एक बड़ा और बढ़ता हुआ घरेलू बाजार भी उसे बाहरी झटकों से कुछ हद तक बचा सकता है। इन सभी हालातों के बीच भारत के सामने भी कई चुनौतियां हैं। भारत को चीन के पैमाने और दक्षता के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपनी मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता को काफी हद तक बढ़ाना होगा। इसके लिए महत्वपूर्ण निवेश, बेहतर बुनियादी ढांचा और कुशल श्रमशक्ति की जरूरत होगी।

