आम जनता बढ़ती महंगाई से परेशान है। तमाम खाने-पीने के सामान तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे आम लोगों का घर का बजट गड़बड़ा रहा है। आज खुदरा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आम लोगों की जेब भी ढीली हो रही है। पिछले काफी अरसे से अनाज, सब्जी और दाल जैसी कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यूं कहे कि इन थोक भाव और खुदरा कीमतों में भारी अंतर लोगों की जेब पर बोझ बढ़ा रहा है। एक तरफ खुदरा और थोक व्यापार आपूर्ति श्रृंखला और वितरण में पूरक की भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक विशिष्ट बाजार आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जबकि खुदरा व्यापार सीधे अंतिम उपभोक्ताओं को लक्ष्य करता है तथा खुदरा दुकानों में छोटी मात्रा में उत्पाद उपलब्ध कराता है। थोक व्यापार आमतौर पर अन्य खुदरा विक्रेताओं को थोक मात्रा में उत्पाद उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित करता है। पिछले चौदह वर्षों के दौरान सबसे ज्यादा गेहंू और आटे की कीमतों में अंतर आया है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष, २०११ में मंडी में आए गेहूं की कीमतों और बाजार में बिकने वाले आटे की खुदरा कीमतों में महज ५ रुपए का अंतर था, जो वर्ष, २०२४ में बढक़र २० रुपए तक हो गया है। इसी प्रकार सब्जियों आलू-प्याज-टमाटर-लहसून के थोक और खुदरा कीमतों के बीच अंतर बढ़ा है। जानकारी के अनुसार चुनिंदा फसलों में उपभोक्ता कीमतों में किसानों की हिस्सेदारी ४० से ६७ फीसदी के बीच है। वहीं खुदरा व्यापारियों का मानना है कि अचानक से कीमतें बढऩे के पीछे आपूर्ति बाधित होना है। वे मानते हैं कि इसके पीछे जमाखोरी जिम्मेदार है। इसके अलावा दूसरा कारण मौसम की मार भी होना है। ओलावृष्टि या फिर अत्यधिक बारिश होने से फसलों के नुकसान होना भी है। सरकार इस ओर ध्यान दे तो जमाखोरी को रोका जा सकता है। नीतिगत हस्तक्षेप से किसानों और उपभोक्ताओं को लाभांवित किया जा सकता है। अगर बाजार से जुड़े बुनियादी ढांचे को सही तथा कोल्ड स्टोरेज क्षमता को बढ़ाया जाए तो संभवत: कीमतों में बढ़ते अंतर को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा आपूर्ति श्रृंखला की अकुशलता को दूर करने से कटाई के बाद के नुकसान को कम किया जा सकता है। इससे किसानों और उपभोक्ताओं को भी लाभ मिलेगा। इससे किसानों को उपज का सही दाम मिलेगा तो खुदरा भावों में कमी आ सकेगी। वहीं महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकेगी।

