हर वर्ष 11 दिसंबर को मनाया जाने वाला यूनिसेफ स्थापना दिवस हमें यह याद दिलाता है कि दुनिया के सबसे कमजोर वर्ग — बच्चों — के लिए वैश्विक स्तर पर कैसे एक संगठित प्रयास की नींव रखी गई थी। वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र बाल कोष) की स्थापना ऐसे समय में की थी, जब द्वितीय विश्व युद्ध के कारण लाखों बच्चे भुखमरी, बीमारी और विस्थापन का शिकार हो चुके थे। उस कठिन दौर में यह संस्था बच्चों के लिए आशा की पहली किरण बनकर सामने आई।
आज यूनिसेफ केवल आपातकालीन सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, पोषण, स्वच्छता, टीकाकरण और बाल अधिकारों की रक्षा जैसे क्षेत्रों में दुनिया भर में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारत सहित अनेक विकासशील देशों में यूनिसेफ की पहल ने कुपोषण कम करने, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर घटाने और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हालांकि, आज भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन, युद्ध, गरीबी और डिजिटल असमानता जैसी समस्याएं बच्चों के भविष्य के लिए नई बाधाएँ खड़ी कर रही हैं। लाखों बच्चे आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसे में यूनिसेफ की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
यूनिसेफ स्थापना दिवस केवल एक संस्था के इतिहास को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर है कि समाज, सरकार और वैश्विक समुदाय बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों में निहित होता है। यदि हम उन्हें स्वस्थ, शिक्षित और सुरक्षित नहीं रख पाए, तो विकास के सारे दावे खोखले रह जाएंगे। आज आवश्यकता है कि हम यूनिसेफ के मूल उद्देश्य को समझें और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदारी निभाएं।

