Friday, July 3, 2026 |
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आपदा की वजह

by Business Remedies
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उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद स्थित धराली में आई आपदा ने देश-दुनिया को गहरे तक आहत किया है। मलबे और बाढ़ के पानी के सैलाब ने जिस तरह घरों, होटलों व बगीचों तथा खेत-खलिहानों को तबाह किया, उसने आम लोगों को भयभीत किया। पहाड़ की भौगोलिक जटिलताओं व बचाव के संसाधन पहुंचाने में देरी से राहत कार्य बाधित हुआ है। नि:संदेह, हादसे से जुड़ा पहलू यह भी है कि तंत्र की अनदेखी व खीरगंगा के विस्तार क्षेत्र की आशंकाओं को नजरअंदाज करके जो निर्माण किया गया, वह सैलाब की जद में आया। सवाल यह है कि वे कौन से कारण थे कि बेहद तीव्र वेग से आये सैलाब ने लोगों को भागने तक का मौका नहीं दिया। हालांकि, मरने वालों की वास्तविक संख्या सामने नहीं आयी है, लेकिन सैलाब की भयावहता को देखकर अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि जनधन की बड़ी हानि हुई होगी। असली सवाल यह है कि ये आपदा कैसे आयी। आजकल ऐसे हादसों की साधारण व्याख्या होती है कि हादसा बादल फटने से हुआ। लेकिन धराली में आपदा की वजह बादल फटना मानने को वैज्ञानिक तैयार नहीं हैं। वैज्ञानिक इस वजह से बादल फटने के तर्क को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि मौसम विभाग के अनुसार 4-5 अगस्त को उस क्षेत्र में महज आठ से दस मिमी बारिश ही हुई थी। वैज्ञानिक मानक के अनुसार बादल फटने की घटना तब होती है जब उस इलाके में 100 मिमी से अधिक बारिश हुई हो। दरअसल, धराली गांव के पीछे डेढ़-दो किलोमीटर लंबा और बेहद घना जंगल है। दोनों तरफ ऊंचे व तीव्र ढलान वाले पहाड़ हैं। जिस खीरगंगा में फ्लैश फ्लड आया है, वो उन्हीं घने जंगलों से होकर गुजरती है। वैज्ञानिक एक तर्क पर विचार कर रहे हैं कि कहीं घने जंगलों वाले इलाके में भू:खलन की वजह से पानी का प्रवाह रुक गया होगा, जिसके बाद अस्थाई झील टूटने से आपदा आई होगी। दरअसल, इस जल प्रलय की जद में आने वाला क्षेत्र फ्लड प्लेन इलाके में बसा है। उसके ऊपर के इलाके में बर्फीले पर्वत बताए जाते हैं। यह हकीकत है कि धराली और उसके आस-पास बेहद संकरी घाटी और ऊंचे पहाड़ हैं। वैज्ञानिकों का तर्क है कि बादल फटने के बाद आने वाला जल प्रवाह इतना तेज नहीं होता। पहले इसकी गति धीमी होती है, कालांतर में गति तेज हो जाती है। इसी वजह से वैज्ञानिक तूफानी गति से पानी-मलबा आने की वजह अस्थायी झील का टूटना बता रहे हैं। भू:खलन या ग्लेशियर टूटने से झील का पानी सैलाब में बदल गया। इस आशंका को मानने की एक वजह यह भी है कि आपदा वाले दिन जो पानी नीचे आया वह काले रंग का था। साथ मलबा स्लेटी रंग का था। तर्क है कि ऐसा काला पानी व स्लेटी रंग का मलबा पहले से जमा हुए स्थान के टूटने के बाद ही आता है। ऐसी ही स्थिति वर्ष 2021 में चमोली जनपद के ऋषिगंगा हादसे के दौरान एक अस्थायी झील टूटने के बाद जमा मलबे के बहकर आने के वक्त देखी गई थी। दरअसल, वैज्ञानिक पहले भी आशंका जताते रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।



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