ट्रंप की टैरिफ दादागिरी और तमाम देशों के आर्थिक संरक्षणवाद से भारत के लिए उभरी आर्थिक चुनौतियों के बीच स्वदेशी का मंत्र ही एक कारगर विकल्प सिद्ध हो सकता है। वाराणसी में अपने लोकसभा क्षेत्र से एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों का आह्वान किया है कि संकल्प लें कि हम अपने घर स्वदेशी सामान ही लाएंगे। उल्लेखनीय है कि कोरोना संकट के दौरान जब वैश्विक आपूर्ति शृंखला डगमगाई थी, तब भी प्रधानमंत्री ने देश में स्वदेशी आंदोलन का आह्वान किया था। नि:संदेह इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन हकीकत है कि अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हुए। आज के ऐसे दौर में जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं घोर संरक्षणवाद का सहारा ले रही हैं, भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को स्वदेशी के संकल्प से ही संरक्षण देना होगा। ये कदम मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में अपरिहार्य हैं क्योंकि दुनिया के तमाम देश अपने-अपने आर्थिक हितों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर अन्यायपूर्ण ढंग से लगाया गया 25 फीसदी का टैरिफ इस कड़ी का ही विस्तार है। ऐसे समय में जब भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है तो हमें घरेलू अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य सुधारने को अपनी प्राथमिकता बनाना ही होगा। यदि हमारी अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर होगी तो फिर कोई वैश्विक नेता दबाव बनाकर हमारी विदेश व आर्थिक नीतियों को प्रभावित नहीं कर सकेगा। विडंबना यह है कि चीन के लगातार शत्रुतापूर्ण व्यवहार व सीमा पर तनाव के बावजूद चीनी उत्पादों का आयात बढ़ता ही जा रहा है। यहां तक कि हमारे त्योहारों का सामान भी चीन से बनकर आ रहा है। इसमें दो राय नहीं कि स्वदेशी का संकल्प देश की वर्तमान जरूरत है, लेकिन देश के उद्यमियों को भी सुनिश्चित करना होगा कि स्वदेशी वस्तुओं का विकल्प गुणवत्तापूर्ण हो। आज के उपभोक्तावादी युग में लोग गुणवत्ता से समझौता करने को तैयार नहीं होते। उद्यमियों को सोचना होगा कि कैसे चीन के उद्यमी कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध करा रहे हैं। सरकार को भी उद्योग व व्यापार जगत पर नौकरशाही के शिकंजे को कम करना होगा। उत्पादन क्षेत्र को हमें उस स्तर तक ले जाने के लिये अनुकूूल वातावरण तैयार करना होगा, जहां गुणवत्तापूर्ण सस्ते उत्पाद तैयार किए जा सकें।

