भारत के बुनियादी ढांचे का प्रभाव दूर-दूर तक महसूस किया जा रहा है। इस पहल ने समन्वित, कुशल और एकीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा देकर बुनियादी ढांचे के विकास में क्रांति ला दी है। मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी पर ध्यान केंद्रित करते हुए सडक़, रेल, वायु और जलमार्गों को एकीकृत करते हुए भारत के लॉजिस्टिक्स परिदृश्य को बदल रही है, परियोजना निष्पादन को सुव्यवस्थित कर रही है और लागत को कम कर रही है। कई महत्वाकांक्षी योजना अब भारत को बुनियादी ढांचे के नेतृत्व वाले विकास के एक नए युग में ले जाने के लिए तैयार है। भारत अब हर सेक्टर में आगे बढऩे की ओर अग्रसर है, जहां पयर्टन हो या फिर अन्य सेवाएं। वहीं भारतीय रेलवे ने विद्युतीकरण में एक बड़ा मील का पत्थर हासिल किया है, जहां 96 प्रतिशत विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। देश पूर्ण विद्युतीकरण के करीब पहुंचने के साथ ही अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर रुख कर रहा है, जिसमें अफ्रीकी देशों को डीजल इंजन निर्यात करने की योजना है। इस पहल का उद्देश्य अफ्रीकी महाद्वीप में भरोसेमंद रेल परिवहन की बढ़ती मांग को पूरा करना है। भारतीय रेलवे ने अफ्रीका को स्टील और माइनिंग उद्योगों के लिए 20 डीजल इंजन निर्यात करने का निर्णय लिया है। इस पहले ऑर्डर का मूल्य 50 करोड़ रुपए है। इन इंजनों की जीवन अवधि 15 से 20 साल तक रहने की उम्मीद है और इन्हें अफ्रीकी देशों की आवश्यकताओं के अनुसार थोड़ा संशोधित किया जाएगा। इस ऑर्डर को रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकनॉमिक सर्विसेज ने सुरक्षित किया है। डीजल इंजन मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीकी देशों में इस्तेमाल किए जाएंगे, जहां के रेल नेटवर्क में केप गेज ट्रैक का उपयोग होता है, जो 1.06 मीटर चौड़ा होता है। जबकि भारत में ब्रॉड गेज का इस्तेमाल होता है, जिसकी चौड़ाई 1.6 मीटर है। अफ्रीकी देशों के संकरे ट्रैक के साथ इन इंजनों को अनुकूल बनाने के लिए इंजनों के एक्सल में बदलाव करना होगा, जिससे पहियों के बीच की दूरी 1.06 मीटर तक कम हो सके। अफ्रीकी बाजार के लिए डीजल इंजनों को पुन: डिजाइन करने का कार्य भारतीय रेलवे की रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन द्वारा किया जाएगा, जो आवश्यक तकनीकी संशोधन का काम करेगी। पेरंबूर लोको वर्क्स के अनुसार आवश्यक बदलाव कोलकाता के चितरंजन लोकोमोटिव वर्कशॉप में किए जाएंगे, जो इस प्रकार के संशोधनों को संभालने में पूरी तरह सक्षम है।

