Saturday, October 3, 2026 |
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‘पेड़ और जंगल हमारी असली संपत्ति हैं, हमें उनकी विरासत को फिर से जीवित करना होगा’: प्रमोद यादव

by Business Remedies
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चारु भाटिया | जयपुर

पर्यावरण संरक्षण आज सामूहिक जिम्मेदारी का विषय बनता जा रहा है। देशभर में समुदाय वायु और जल प्रदूषण, भूजल के घटते स्तर, वनों की कटाई और बदलती जलवायु परिस्थितियों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। निधिवन फाउंडेशन के संस्थापक प्रमोद यादव के लिए इंसान और प्रकृति का संबंध एक व्यक्तिगत यात्रा रहा है, जो धीरे–धीरे पर्यावरण संरक्षण के लिए एक संगठित प्रयास में बदल गया। अलवर और भरतपुर के बीच स्थित एक गांव से आने वाले प्रमोद यादव का प्रकृति से जुड़ाव बचपन में ही हो गया था। बाद में उन्होंने एक आश्रम स्थापित किया, जहां हर दिन हजारों पक्षी आते हैं। पक्षियों, पेड़–पौधों और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के बीच संबंधों को समझने के उनके अनुभव ने उन्हें कोविड-19 महामारी के बाद निधिवन फाउंडेशन स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। आज यह फाउंडेशन राजस्थान में पौधरोपण, वनीकरण, सिंचाई और पर्यावरण जागरूकता से जुड़ी पहलों पर काम कर रहा है और अब तक करीब 1.5 लाख पेड़ लगाए जा चुके हैं। इस बातचीत में वह अपनी यात्रा, हरियाली के महत्व, संरक्षण में युवाओं की भूमिका, पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ की चुनौतियों और औद्योगिक विकास तथा पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन की जरूरत पर चर्चा कर रहे हैं।

प्रश्न: आप पर्यावरण संरक्षण के समर्थक हैं और आपने निधिवन फाउंडेशन की स्थापना की है। अब तक की अपनी यात्रा के बारे में बताइए।

उत्तर: मैं अपनी यात्रा की शुरुआत उस खोज से करना चाहूंगा, जिसने प्रकृति को देखने का मेरा नजरिया बदल दिया। एक बार मुझे ओशो के विचार सुनने का अवसर मिला। उन्होंने कहा था अगर इस पृथ्वी पर पुण्य मिलता है तो वह पक्षियों को दाना डालने से। एक दार्शनिक के रूप में उनके इस विचार को सुनकर मुझे लगा कि इसके पीछे जरूर कोई गहरी वजह होगी। इसे समझने में मैंने करीब छह महीने लगाए।

जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो सबसे पहली जरूरत उसे सांस लेने की होती है और हम जिस ऑक्सीजन में सांस लेते हैं, उसका संबंध पौधों के जीवन से है। पौधे बीजों से उगते हैं और बीजों को फैलाने में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे मुझे पक्षियों, पेड़–पौधों और मानव जीवन के बीच के आपसी संबंध को समझने में मदद मिली। इसलिए मेरे लिए पक्षियों को दाना खिलाना केवल दया का कार्य नहीं रहा, बल्कि यह बड़े पारिस्थितिक चक्र को समझने और उसमें योगदान देने का एक माध्यम बन गया।

मैं अलवर और भरतपुर के बीच स्थित एक गांव से आता हूं, जो जयपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर है। वहां मेरा एक आश्रम है, जहां मैं पक्षियों, खासकर गौरैया, के लिए ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करता हूं, जिसमें वे आ सकें, रह सकें और फल–फूल सकें। हर दिन पक्षियों के लिए करीब 25 किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया जाता है और लगभग 2,000 पक्षी रोज वहां आते हैं।

प्रकृति के संरक्षण का विचार बचपन से ही मेरे साथ रहा, लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद मैंने इसे एक संगठित रूप देने का फैसला किया और निधिवन फाउंडेशन की स्थापना की।

आज हमारे सामने वायु प्रदूषण, मिट्टी का प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूजल का घटता स्तर, सूखा और बाढ़ जैसी कई गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियां हैं। मेरा मानना है कि इनमें से कई समस्याओं से निपटने में पेड़ और जंगल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हमें पेड़ों और जंगलों की विरासत को फिर से जीवित करने की जरूरत है, क्योंकि ये हमारे सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों में शामिल हैं।

इसी उद्देश्य के साथ निधिवन फाउंडेशन राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहा है। हमारा उद्देश्य केवल अधिक से अधिक पेड़ लगा देना नहीं है। पौधरोपण से पहले हम जमीन का अध्ययन करते हैं, उसकी उपयुक्तता समझते हैं और यह देखते हैं कि वहां किस प्रकार के पौधे जीवित रह सकते हैं। पौधरोपण के बाद हम तीन वर्षों तक उन पेड़ों की जिम्मेदारी लेते हैं और उन्हें पानी, खाद तथा अन्य जरूरी सहायता उपलब्ध कराते हैं। इसके बाद जिम्मेदारी जमीन के मालिक या संबंधित संस्था को सौंप दी जाती है, हालांकि हम पौधों की स्थिति देखने के लिए वहां जाते और निगरानी करते रहते हैं।

हम सीएसआर के सहयोग से भी पौधरोपण परियोजनाएं संचालित करते हैं और कुछ मामलों में जिस जमीन या संस्था के परिसर में बगीचा विकसित किया जाता है, उसी के नाम पर उसका नाम रखा जाता है। अब तक हम करीब 1.5 लाख पेड़ लगा चुके हैं। हमारी परियोजनाओं में ड्रिप इरिगेशन जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।

हम कॉलेज विद्यार्थियों के लिए एक इंटर्नशिप कार्यक्रम भी विकसित कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य है कि युवा केवल सैद्धांतिक रूप से पर्यावरण संरक्षण के बारे में न पढ़ें, बल्कि उन्हें इसका व्यावहारिक अनुभव भी मिले। इस पहल के लिए हम फिलहाल जयपुर के प्रमुख कॉलेजों के साथ बातचीत कर रहे हैं।

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले अन्य एनजीओ से निधिवन फाउंडेशन का दृष्टिकोण किस तरह अलग है?

उत्तर: निधिवन फाउंडेशन निश्चित रूप से वनीकरण और पौधरोपण को बढ़ावा देता है, लेकिन हमारा काम पेड़ लगाने के साथ खत्म नहीं हो जाता। हम तीन वर्षों तक पौधों की जिम्मेदारी लेते हैं और उन्हें पानी तथा खाद सहित जरूरी सहायता उपलब्ध कराते हैं।

हम आमतौर पर ऐसी जगहों को प्राथमिकता देते हैं, जहां शुरुआती तीन वर्षों की अवधि के बाद भी पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी जारी रह सके। सरकारी सहायता प्राप्त या संस्थागत स्थान कभी–कभी इस निरंतरता को बनाए रखने में मदद करते हैं। परियोजना के आधार पर हम पौधरोपण स्थल की सुरक्षा के लिए फेंसिंग और ट्यूबवेल की व्यवस्था में भी सहयोग करते हैं तथा जरूरत के अनुसार ड्रिप इरिगेशन की सुविधा शामिल करते हैं।

हमारे दृष्टिकोण का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हम अलग–अलग जगहों पर अकेले पेड़ लगाने के बजाय बड़े स्तर पर पौधरोपण पर ध्यान देते हैं। पहले हम स्थान का अध्ययन करते हैं और वहां के लिए उपयुक्त प्रजातियों की पहचान करते हैं। इसके बाद उसी के अनुरूप पौधरोपण परियोजना विकसित की जाती है।

जिम्मेदारी सौंपने के बाद भी हम नियमित दौरों के माध्यम से पौधरोपण की निगरानी करते रहते हैं। हमारा प्रयास होता है कि पेड़ लगाने में किया गया प्रयास उनके लंबे समय तक जीवित रहने में भी बदल सके।

स्थान अलग–अलग हो सकता है। यह कोई स्कूल, संस्थान का परिसर, श्मशान स्थल या अन्य उपयुक्त जमीन हो सकती है। पौधरोपण से पहले हम पौधों की जरूरतों के अनुसार उस जगह का अध्ययन करते हैं।

प्रश्न: पर्यावरण बचाने में सरकार की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

उत्तर: मेरा मानना है कि सरकार ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर रुचि दिखाई है और पौधरोपण तथा वन संरक्षण से जुड़ी कई पहल की हैं। खास तौर पर वन विभागों ने जंगलों के संरक्षण और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। हालांकि, एक क्षेत्र जिस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, वह है उनका प्रभावी क्रियान्वयन। किसी नीति का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब उसे जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू किया जाए।

जन जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कई लोग सोचते हैं कि जब तक उन्हें ऑक्सीजन और बुनियादी संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं, तब तक उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन पर्यावरण संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी है। जंगलों, जल स्रोतों, मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी से भी होनी चाहिए।

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण के लिए काम शुरू करने वाले किसी एनजीओ के सामने आपको कौन–कौन सी चुनौतियां दिखाई देती हैं?

उत्तर: सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लोगों की धारणा है। कभी–कभी यह धारणा होती है कि अगर कोई संगठन एनजीओ है, तो वह सामाजिक कल्याण के बजाय मुनाफे के लिए पैसे इकट्ठा कर रहा होगा। इस क्षेत्र में ईमानदारी से काम करने वाले संगठनों के लिए यह धारणा उचित नहीं है।

कुछ संगठन जिम्मेदारी से काम नहीं करते होंगे, लेकिन उनके अनुभव को सभी एनजीओ पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।

एक अन्य बड़ी चुनौती फंडिंग की है। पर्यावरण के क्षेत्र में सार्थक काम करने के लिए वास्तविक संगठनों को वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है। पौधे खरीदने, खाद उपलब्ध कराने, सिंचाई सुविधाएं स्थापित करने, पौधरोपण स्थल पर फेंसिंग करने या शोध करने जैसी बुनियादी गतिविधियों के लिए भी धन की आवश्यकता होती है।

पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक प्रतिबद्धता भी जरूरी है। पौधरोपण एक दिन की गतिविधि नहीं है। अगर हम चाहते हैं कि पेड़ जीवित रहें, तो उनकी देखभाल और रखरखाव में भी निवेश करना होगा। इसलिए पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ के लिए पर्याप्त और पारदर्शी फंडिंग बेहद महत्वपूर्ण है।

प्रश्न: अंत में, पर्यावरण संरक्षण को लेकर आप आम जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर: मेरा संदेश यही होगा कि आज के दौर में पैसा कमाना और जीवन स्तर को बेहतर बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने आसपास के पर्यावरण की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। हम अपने जीवन को पर्यावरण से अलग नहीं कर सकते।

अगर सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा ही नहीं होगी, तो धन या विलासिता का कोई भी स्तर इसकी भरपाई नहीं कर सकता। इसलिए लोगों को पेड़ों, जंगलों, पानी और अपने आसपास के प्राकृतिक पर्यावरण के महत्व को समझना होगा।

हमें केवल अपने लिए अधिक सुविधाजनक या विलासितापूर्ण स्थान बनाने के लिए पेड़ों को नहीं काटना चाहिए। हर पेड़ को हटाने का किसी न किसी रूप में पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है और अंततः इसका परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा कोई असाधारण कदम उठाना जरूरी नहीं है। इसकी शुरुआत छोटे और जिम्मेदार फैसलों तथा प्रकृति के प्रति अपने नजरिए में बदलाव से होती है। अगर हर व्यक्ति पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करे, तो व्यक्तिगत प्रयास मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

हमारे बाद आने वाली पीढ़ियों को वही पर्यावरण विरासत में मिलेगा, जो हम उनके लिए छोड़कर जाएंगे। इसलिए आज प्रकृति की रक्षा करना केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

 



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