केंद्र सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए वैसे तो कई योजनाएं शुरू कर रखी है। पर इन योजनाओं की क्रियान्विति से ही भारत विकसित देशों की श्रेणी आ सकेगा। इन योजना में एक है निर्यात प्रोत्साहन मिशन। यह केंद्र सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, विशेषकर एमएसएमई को पहली बार निर्यात करने वाले उद्यमों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को निर्यात के लिए सक्षम बनाना है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे 12 नवंबर, 2025 को मंजूरी दी। इसके लिए वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक छह वर्षों में 25,060 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। सरकार ने पुराने और अलग-अलग निर्यात सहायता उपायों को अधिक एकीकृत, डिजिटल और परिणाम आधारित व्यवस्था में लाने का प्रयास किया है। ईपीएम का लक्ष्य केवल निर्यात पर सब्सिडी देना नहीं है, बल्कि भारतीय उद्यम को उत्पाद बनाने से लेकर विदेशी ग्राहक तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया में मदद करना है। जहां एक ओर भारत की अर्थव्यवस्था में निर्यात की भूमिका बढ़ाने के बावजूद छोटे भारतीय निर्यातकों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनमें प्रमुख रूप से निर्यात के लिए पर्याप्त और सस्ता कार्यशील पूंजी ऋण नहीं मिलना, अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और प्रमाणन मानकों को पूरा करने की ऊंची लागत, ब्रांडिंग और पैकेजिंग में कमजोरी, विदेशी बाजारों की जानकारी का अभाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों और खरीदारों तक सीमित पहुंच, लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई की अधिक लागत और विदेशों में वेयरहाउसिंग और की सीमित व्यवस्था होना है। इसके अलावा छोटे उद्यमों के लिए नए और जोखिम वाले बाजारों में प्रवेश कठिन होना और ई-कॉमर्स के माध्यम से सीधे विदेशों में बिक्री करने की क्षमता का पर्याप्त उपयोग ना होना है। इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य छोटे शहरों और जिलों को वैश्विक बाजार तथा मुंबई, दिल्ली, चेन्नई या बेंगलुरु जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों तक सीमित रहने के बजाय कम एक्सपोर्ट वाले जिलों और कलस्टरों को भी निर्यात से जोडऩे की दिशा में है। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि किसी जिले का पारंपरिक उत्पाद जैसे हस्तशिल्प, कालीन, वस्त्र, चमड़े का सामान, कृषि प्रसंस्कृत उत्पाद आदि सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बना सकते हैं।

