जून-जुलाई के बाद अगस्त का महीना भी निकल गया, लेकिन मानसून की बारिश औसत से कम होने के कारण गर्मियों में आमजन का पेयजल किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। अब सितंबर माह में बारिश की थोड़ी बहुत आस जरूर है, पर लगता नहीं है कि वह पूरी तरह से जलाशयों, तालाबों और भूजल का पर्याप्त पुनर्भरण कर पाए। मानसून के अंत तक कुछ राज्यों में वर्षा सामान्य से कम रहती है । इसलिए राज्य सरकारों को वर्ष, 2027 की गर्मियों में पेयजल संकट की आशंका को अभी से गंभीरता से लेनी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में मौसमी वर्षा लगभग 16-18 फीसदी कम बताई गई है, हालांकि सितंबर में कुछ सुधार की संभावना नजर आ रही है। अगर सितंबर में भी बारिश ना के बराबर हुई तो गर्मियों में पानी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। कम मानसूनी आवक का सीधा असर अगले गर्मी के लिए उपलब्ध पेयजल भंडार पर पड़ेगा। भूजल स्तर और नीचे जा सकता है। कुएं, हैंडपंप और ट्यूबवेलों की जलधारण क्षमता घटेगी। राजस्थान सरकार भी अनियमित वर्षा और गिरते भूजल स्तर को पेयजल आपूर्ति की प्रमुख चुनौती मानकर चल रही है। गांवों और छोटे कस्बों में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ेगी। दूर-दराज के ढाणियों और पशुपालक क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा कठिन हो सकती है। शहरी क्षेत्रों में पानी की कटौती या कम दबाव की नौबत आ सकती है। पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। जब जलस्रोतों में पानी बहुत कम रह जाता है तो फ्लोराइड, लवणता और अन्य गुणवत्ता संबंधी समस्याएं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं। ऐसे में सरकार को अभी से सितंबर-अक्टूबर से ही जिलेवार समर वाटर सिक्योरिटी प्लान बनाना चाहिए। हर पेयजल स्रोत का सर्वे और जल-बजट तैयार हो। प्रत्येक जिले में बांध, तालाब, कुएं, ट्यूबवेल और शहरी जलाशयों में उपलब्ध पानी तथा अगले गर्मी तक अनुमानित मांग का आकलन किया जाए। जिन स्रोतों के सूखने की संभावना अप्रैल-मई से पहले है, उन्हें अभी चिन्हित किया जाए। अतिरिक्त जलस्रोत अभी से तैयार किए जाएं। खराब हैंडपंपों की मरम्मत, निष्क्रिय कुओं का पुनर्जीवन, आवश्यकता वाले क्षेत्रों में नए स्रोत तथा वैकल्पिक पाइपलाइन कनेक्शन तैयार किए जाएं।

