मीडिल ईस्ट में काफी समय से चल रहा संघर्ष कितना लंबा चलेगा, यह किसी को पता नहीं है। इस संघर्ष के चलते जहां भारत सहित कई देशों में तेल की कीमतें ही नहीं बल्कि ऊर्जा-सुरक्षा, रुपए, महंगाई और विदेश नीति प्रभावित हो रही है। इस तनाव से कई देशों में क्रूड ऑयल की किल्लत आ गई है। भारत सरकार को अभी से सस्ते में एसपीआर भरना और नए सप्लायर जोडऩा सबसे समझदारी का काम होगा। इसके अलावा भारत को कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ संवाद बनाए रखना भी जरूरी है। फिलहाल आगे किल्लत नहीं हो इसके लिए भारत कू्रड ऑयल की पूर्ति के लिए रूस से इसका आयात कर रहा है। इस वर्ष जून और जुलाई में रूस से आयात बढक़र 2.7 से 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था, जो भारत के कुल आयात का लगभग 50 फीसदी से अधिक था। वहीं अगस्त में रूस से आयात आंशिक रूप से घटकर करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है, फिर भी रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है। संघर्ष लंबा चला या फिर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ तो क्रूड ऑयल के दाम डॉलर११०-१२० प्रति बैरल पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल एक देश पर निर्भर रहने के बजाय लैटिन अमेरिका यानि वेनेजुएला, ब्राजील, अफ्रीका और अमेरिका से तेल आयात का दायरा बढ़ाना चाहिए। वैश्विक कीमतों के बड़े झटकों से बचने के लिए भारत को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की क्षमता का तेजी से फैलाव भी करना चाहिए। अभी भारत के पास 74 दिन का रिजर्व है, इसे 90 दिन तक ले जाना जरूरी है। उम्मीद यह भी बनी हुई है कि अगले 2-3 महीने कू्रड ऑयल के दाम डॉलर 85-95 प्रति बैरल के बीच रहे सकते हैं। भारत के लिए रूसी तेल अब भी सबसे सस्ता इंश्योरेंस है, पर एक ही देश पर 5० फीसदी निर्भरता खतरनाक है।

