नई दिल्ली | बिजनेस रेमेडीज | भारत का माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट उद्योग आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर बड़ी ताकत बन सकता है। इसी दिशा में Confederation of Indian Industry (CII) और Boston Consulting Group (BCG) ने संयुक्त रूप से “Pressing the Throttle: How India’s Mining and Construction Equipment Industry Can Support Domestic Ambitions and Become a Global Force” नाम से एक रिपोर्ट जारी की है।
इस रिपोर्ट में भारत को माइनिंग और कंस्ट्रक्शन उपकरणों के निर्माण और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए विस्तृत रणनीति पेश की गई है। रिपोर्ट में भारत के माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर का व्यापक आकलन किया गया है। साथ ही घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने, नई तकनीकों को तेजी से अपनाने, स्थानीयकरण बढ़ाने, वैश्विक प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और भारत को इस क्षेत्र में पसंदीदा मैन्युफैक्चरिंग एवं एक्सपोर्ट हब बनाने के लिए स्पष्ट रोडमैप दिया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को हासिल करने में माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। CII के महानिदेशक Chandrajit Banerjee ने कहा कि माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर भारत की आधारभूत संरचना और औद्योगिक विकास की महत्वाकांक्षाओं का अहम हिस्सा है।
इस क्षेत्र की अगली विकास यात्रा के लिए उद्योग और सरकार के बीच मजबूत सहयोग, अधिक निवेश, नवाचार, कौशल विकास और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर विशेष ध्यान देना होगा। यह रिपोर्ट भविष्य के लिए मजबूत, प्रतिस्पर्धी और तकनीक आधारित माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव देती है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट उद्योग दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हो चुका है। वर्तमान में इस उद्योग का अनुमानित आकार 17 अरब अमेरिकी डॉलर है और इसमें हर साल 10 से 12 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे, शहरी बुनियादी ढांचे, खनन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे निवेश के कारण माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट से जुड़े क्षेत्रों में पूंजीगत व्यय 2025 में लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2030 तक 9 से 10 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में मशीनीकरण का स्तर अभी भी वैश्विक औसत से काफी कम है। इसका मतलब है कि भविष्य में आधुनिक उपकरणों की मांग, उत्पादकता और नई तकनीकों को अपनाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

