नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान उर्वरक विभाग ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाकर भारत ने न केवल उत्पादन क्षमता को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक बाजार में आने वाले झटकों से किसानों को भी सुरक्षित किया है। पश्चिम एशिया संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई और समुद्री जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हुई। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सक्रिय रणनीति अपनाते हुए खरीफ मौसम के लिए किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की है।
आधिकारिक बयान के अनुसार, आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पिछले 12 वर्षों में देश में उर्वरक उत्पादन क्षमता में बड़ा विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 के बाद से 6 नए विशाल यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए हैं, जिनसे प्रतिवर्ष 76.2 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जुड़ी है। इसके अलावा 25.4लाख मीट्रिक टन वार्षिक क्षमता वाले 2 और उच्च क्षमता के यूरिया संयंत्र जल्द उत्पादन शुरू करने वाले हैं। इन प्रयासों का परिणाम यह रहा कि देश का घरेलू यूरिया उत्पादन वर्ष 2014-15 में 225 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2023-24 में रिकॉर्ड 314.07लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। वहीं वर्ष 2024-25 में उत्पादन 306.67लाख मीट्रिक टन के स्तर पर बना रहा। यूरिया के साथ-साथ फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों के निर्माण में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014-15 में जहां इन उर्वरकों का उत्पादन 159.54लाख मीट्रिक टन था, वहीं वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 211.22लाख मीट्रिक टन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र आधुनिक उत्पादन संयंत्र स्थापित कर इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के बाद केंद्र सरकार ने वैकल्पिक परिवहन मार्गों की तलाश की और वैश्विक उत्पादकों से सीधे कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए राजनयिक स्तर पर भी प्रयास किए। सरकार ने उर्वरक आपूर्ति की निगरानी के लिए सचिवों के 7 सशक्त समूह गठित किए। उर्वरक सचिव की अध्यक्षता में 10 उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें आयोजित की गईं। साथ ही पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सहयोग से घरेलू प्राकृतिक गैस आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का समाधान भी किया गया। खरीफ 2026 मौसम के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा कुल आवश्यकता 383.9लाख मीट्रिक टन आंकी गई है। इसके मुकाबले देश के पास लगभग 200.98 लाख मीट्रिक टन का प्रारंभिक भंडार उपलब्ध है, जबकि वर्तमान उपलब्ध भंडार 195.79 लाख मीट्रिक टन के आसपास है। यह पारंपरिक 33प्रतिशत बफर मानक की तुलना में 51 प्रतिशत से अधिक अग्रिम उपलब्धता को दर्शाता है, जो अब तक का अभूतपूर्व स्तर है।
संकट के बाद घरेलू उत्पादन 118.15लाख मीट्रिक टन पर मजबूत बना रहा। रणनीतिक आयात और सफल वैश्विक संयुक्त निविदाओं के माध्यम से कुल उर्वरक उपलब्धता में 153.79लाख मीट्रिक टन की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय महंगाई के प्रभाव को किसानों तक पहुंचने से भी रोका है। वैश्विक बाजार में कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद भारतीय किसानों के लिए उर्वरकों की खुदरा कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई।
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत प्रति बोरी ₹.4100 से अधिक है, लेकिन भारतीय किसानों को 45 किलोग्राम की बोरी मात्र ₹.266.5 में उपलब्ध कराई जा रही है। इसी प्रकार, डाय-अमोनियम फॉस्फेट की वैश्विक कीमत प्रति 50किलोग्राम बोरी ₹.5000 से अधिक होने के बावजूद किसानों को यह उर्वरक केवल ₹.1350 प्रति बोरी की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है। पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को भी बढ़ावा दिया गया है। फोर्टिफाइड जैविक खाद और फॉस्फेट समृद्ध जैविक खाद जैसी नई उर्वरक श्रेणियों की बिक्री वित्त वर्ष 2025-26 में पिछले वर्ष की तुलना में 7गुना बढ़ी। अमोनियम सल्फेट की खपत में लगभग 60,000 टन की वृद्धि दर्ज की गई। साथ ही कृषि विज्ञान केंद्रों के तकनीकी मार्गदर्शन में रिकॉर्ड 1.84लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हरित खाद कार्यक्रम शुरू किया गया।

