भारत के मेक इन इंडिया के विजन का शुरू हुए 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं। मेक इन इंडिया की शुरुआत 25 सितंबर, 2014 को हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना, आयात पर निर्भरता कम करना, रोजगार बढ़ाना, और विदेशी निवेश आकर्षित करना है। वोकल फॉर लोकल, मेक इन इंडिया का ही एक मंत्र है। वर्ष 2026 तक देखें तो यह विजन आधा पूरा माना जा सकता है। कई क्षेत्रों में बड़ी सफलता मिली है, लेकिन कई बुनियादी चुनौतियां अब भी बाकी हैं।
अब तक मेक इन इंडिया के तहत विनिर्माण क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है। भारत आज दुनिया के सबसे तेज बढ़ते विनिर्माण देशों में गिना जा रहा है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, रेलवे, ऑटोमोबाइल और फार्मा में तेज प्रगति हुई है। विशेष रूप से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बना है। मोबाइल फोन निर्यात 2014 की तुलना में कई गुना बढ़ा है।
PLI योजनाओं से लगभग 2 लाख करोड़ रुपए निवेश आकर्षित हुआ है। इसके अलावा रोजगार सृजन हुआ है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि PLI योजनाओं से 12 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिले हैं। FDI में वृद्धि हुई है। विदेशी कंपनियां अब China के विकल्प के रूप में भारत को देख रही हैं। कई बड़ी कंपनियों ने भारत में उत्पादन बढ़ाया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश तेज हुआ है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार हुआ है, जहां सरकार बंदरगाह, एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक्स सुधार जैसी परियोजनाओं पर बड़े स्तर पर काम भी कर रही है। भारत अब iPhone Assembly का बड़ा केंद्र बन चुका है। 75 फीसदी मोबाइल आयात निर्भरता लगभग समाप्त हो गई है। Uttar Pradesh और Tamil Nadu इलेक्ट्रॉनिक्स हब बन रहे हैं।
भारत ने रक्षा आयात कम किए हैं। BrahMos, Tejas, Artillery System का निर्यात शुरू किया है और निजी रक्षा उद्योग को बढ़ावा दिया है। पर अब भी भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत अभी भी कई क्षेत्रों में केवल Assembly करता है, मूल प्रौद्योगिकी नहीं बनाता है। इसे पूरी तरह से दूर कर ही भारत मेक इन इंडिया के विजन को पूरा किया जा सकता है।

