भारत में पिछले कुछ समय से देश में ‘नकली’ का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। पहले तो नकली खाद्य पदार्थों आदि की बात ही सुनी जाती थी, लेकिन अब यह बीमारी उच्च सरकारी पदों से होते हुए विभिन्न विभागों के फर्जी प्रमाण पत्रों और हथियारों के फर्जी लाइसेंसों तक भी पहुंच गई है। पिछले तीन महीने के आंकडे बताते हैं कि हथियारों के फर्जी पहचान पत्र बनाकर सप्लाई किए गए। इस वर्ष अप्रैल को गाजियाबाद क्राइम ब्रांच ने फर्जी तरीके से हथियारों के लाइसेंस तैयार करने और उसके बदले में मोटी रकम वसूल करने वाले एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया। उसके कब्जे से 8 देसी हथियार, फर्जी शस्त्र लाइसेंस और सेना का फर्जी पहचानपत्र आदि बरामद किए गए। वहीं जून को बिहार में मुजफ्फरपुर की पुलिस ने फर्जी तरीके से हथियारों के लाइसेंस बनवाकर टोल प्लाजा पर ड्यूटी कर रहे 2 सुरक्षा कर्मियों को 2 बंदूकों, हथियार और 10 कारतूसों के साथ गिरफ्तार किया। जुलाई को अमृतसर कमिश्नरेट पुलिस ने हथियारों के फर्जी लाइसेंस बनाने वाले गिरोह के 2 सदस्यों तथा 6 फर्जी हथियार लाइसेंस धारकों को गिरफ्तार करके फर्जी हथियार लाइसेंस रैकेट का भंडाफोड़ किया। यह रैकेट ‘तरनतारन सेवा केंद्र’ के जिला मैनेजर सूरज भंडारी की मिलीभगत से चलाया जा रहा था। गिरोह के गिरफ्तार सदस्यों में तरनतारन सेवा केंद्र का कर्मचारी व एक फोटोकापी करने वाली दुकान का मालिक भी शामिल हैं। गिरोह का सरगना हथियारों का लाइसेंस बनाने के लिए प्रति ग्राहक 1.50 लाख रुपए फीस लेता था, जिसमें से वह कमीशन के रूप में 5-10 हजार रुपए फोटोकापी करने वाली दुकान के मालिक को तथा 10-20 हजार रुपए सॢवस केंद्र के कर्मचारी को देता था। इन सभी घटनाओं से पता चलता है कि देश में जालसाजी की बुराई कितनी बढ़ रही है। विशेष रूप से यह बात ध्यान देने योग्य है कि यदि लोगों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हथियारों तक के लाइसेंस मिलने लगेंगे तो यह स्थिति सामाजिक सुरक्षा के लिए कितनी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। अत: देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले ऐसे तत्वों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

