भारत में पिछले कुछ सप्ताह से चीनी की कीमतों को लेकर हो-हल्ला मचा हुआ है। यह मचना भी जरूरी है, क्योंकि इसकी दरें खुदरा बाजार में करीब 48 रुपए से बढक़र 60 से 65 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई हैं। इसकी वजह मुख्य रूप से गन्ने की पैदावार में कमी, त्योहारी मांग, वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में बाधा और व्यापारियों द्वारा जमाखोरी (होर्डिंग) को लेकर है। इसके अलावा मौसम की मार और कुछ इलाकों में फसल को नुकसान के कारण सीजन का चीनी उत्पादन शुरुआती अनुमान से काफी नीचे आने की उम्मीद है। सरकार का मौजूदा अनुमान करीब 306 लाख टन है, जबकि शुरुआती अनुमान 343 टन था। वहीं त्योहारी मांग सामने है, अगस्त से नवंबर तक गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के कारण मिठाई, बेकरी, पेय आदि में चीनी की मांग बढ़ती है। सरकार ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि कुछ व्यापारियों व मध्यस्थों ने जरूरत से ज्यादा स्टॉक रखा और वास्तविक माल की आवाजाही के बिना भी सौदे किए, जिससे कृत्रिम कमी का माहौल बना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार भी महंगा हुआ है। सरकार के अनुसार जून के अंत से अगस्त के बीच अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत में 16 से 18 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है। सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि इसके लिए एथेनॉल नीति जिम्मेदार नहीं है। घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए चीनी के निर्यात को प्रतिबंधित किया है। जमाखोरी रोकने के लिए थोक व्यापारियों और डीलरों पर स्टॉक लिमिट लागू की गई है। घरेलू कमी को पूरा करने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति दी गई है। आपूर्ति बढ़ाने के लिए चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से नया पिराई सत्र शुरू करने का निर्देश दिए गए हैं। अब देखना यह है कि आने वाले समय में सरकार के सख्त कदमों से क्या बाजार में सट्टेबाजी पर लगाम लग सकेगी और थोक स्तर पर कीमतों में सुधार हो सकेगा? जहां तक है खुदरा बाजारों में कीमतों को पूरी तरह सामान्य होने में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन बड़े स्तर पर सप्लाई बढऩे से आने वाले दिनों में कीमतों में और कमी आने की उम्मीद तो है।

