- थोक महंगाई 3.88 फीसदी पर पहुंची, 38 महीने का रिकॉर्ड टूटा
- रोजाना की जरूरत के सामान और ईंधन कीमतों में उछाल से बढ़ी महंगाई
जयपुर | बीआर न्यूज नेटवर्क | इस वर्ष मार्च महीने में थोक महंगाई बढक़र 3.88 फीसदी पर पहुंच गई है। फरवरी के यह 2.13 फीसदी पर थी। यानी एक महीने के अंदर 1.75 फीसदी की बढ़ोतरी महंगाई को बढ़ावा देने की ओर ले जा रही है। इस थोक महंगाई ने तीन वर्ष (38 महीने) का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। पहले थोक महंगाई जनवरी, 2023 में 4.73 फीसदी पर पहुंच गई थी। यह जानकारी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बुधवार को दी। मार्च में थोक महंगाई दर में वृद्धि मुख्य रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस, गैर-खाद्य वस्तुओं, बुनियादी धातुओं के विनिर्माण और खाद्य पदार्थों आदि की कीमतों में उछाल के कारण हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, ईंधन और ऊर्जा की कीमतों में मार्च में फरवरी के मुकाबले 4.13 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। खनिज तेल की कीमतों में मार्च में पिछले महीने के मुकाबले 8.77 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। बिजली की कीमत में मार्च में 5.07 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है।
रोजाना की जरूरत वाले सामान में वृद्धि
रोजाना की जरूरत वाले सामानों की महंगाई 3.27 फीसदी से बढक़र 6.36 फीसदी हो गई है। वहीं खाने-पीने की चीजों की महंगाई में कोई बदलाव नहीं है, ये 1.85 फीसदी पर बनी हुई है।
प्रोडक्टिव सेक्टर पर पड़ता बुरा असर
थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो उत्पादक इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के माध्यम से ही इसे नियंत्रित कर सकती है। पहले जहां तनाव के कारण कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी।
यूं जाने थोक और रिटेल महंगाई में अंतर
थोक महंगाई (डब्लूपीआई) का अप्रत्यक्ष असर पड़ता है। अगर थोक स्तर पर कीमतें बढ़ें तो उत्पादक/कंपनियां अपना लागत बढ़ा कर रिटेल कीमतें बढ़ा सकती हैं जैसे पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी, फिर सामान महंगा होगा। लंबे समय तक उच्च डब्लूपीआई बने रहने से नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। अगर डब्लूपीआई बढ़े और सीपीआई स्थिर रहे, तो तुरंत आम आदमी को कम असर पड़ता है क्योंकि खुदरा मार्जिन या सरकारी नियंत्रण हो सकता है।
रिटेल महंगाई(सीपीआई) का सीधा और तत्काल असर आम आदमी पर पड़ता है। अगर सीपीआई बढ़ती है तो दूध, सब्जी, अनाज, तेल, परिवहन, किराना, स्कूल फीस, मेडिकल खर्च आदि महंगे हो जाते हैं। जेब पर बोझ बढ़ता है, खरीदारी क्षमता कम हो जाती है। मध्यम और निम्न वर्ग पर जीवनयापन की लागत बढ़ जाती है। यह कह सकते हैं कि आम आदमी रोजाना सीपीआई महसूस करता है, जबकि डब्लूपीआई भविष्य की चेतावनी की तरह काम करता है। अगर दोनों बढ़ें तो महंगाई का दबाव ज्यादा होता है।

