अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध के एक नए अध्याय की फिर से शुरुआत हो चुकी है। जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से आयातित कई वस्तुओं पर १२५ फीसदी का व्यापक टैरिफ लगा दिया है। वहीं इसके जवाब में बीजिंग ने प्रमुख अमेरिकी सामानों पर अपने टैरिफ को 84 फीसदी तक बढ़ा दिया। अब दुनिया की नजरें इन दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर टिकी हैं, जो आर्थिक टकराव के मुहाने पर खड़ी हैं और इसके परिणाम विनाशकारी भी हो सकते हैं। यह केवल व्यापार असंतुलन की लड़ाई नहीं है बल्कि वैश्विक प्रभुत्व के लिए एक उच्च दांव का जुआ है। अमेरिका का लक्ष्य चीन की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं को रोकना और घरेलू उद्योग को पुनर्जीवित करना है, लेकिन यह रणनीति जोखिम भरी है। अमेरिकी उपभोक्ताओं को जल्द ही बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है और जो अमेरिकी कंपनियां चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर हैं, वे प्रभाव के लिए तैयार हो रही हैं। वहीं, चीन आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है और नए व्यापारिक गठबंधनों का निर्माण कर रहा है, ताकि वह इस संघर्ष में टिके रह सके और अमेरिका को मात दे सके। इस डिजिटल युग के शीत युद्ध में, टैरिफ गोलियों की तरह हैं और आपूर्ति श्रृंखलाएं युद्ध के मैदान बन चुकी हैं। पर यह आर्थिक रूसी रूलेट का खेल किसी को भी असली जीत नहीं देगा। केवल वैश्विक स्तर पर नुकसान होगा। बाकी दुनिया, जो इस टकराव की चपेट में है, अब इंतजार कर रही है कि वह इस संकट के असर के हिसाब से अपने हितों को कैसे पुन: परिभाषित करे। अब सवाल यह नहीं है कि क्या इसके परिणाम होंगे बल्कि यह है कि वे कितने गहरे होंगे और सबसे पहले कौन इसकी कीमत चुकाएगा?

