पिछले चालीस दिनों से चले मिडिल ईस्ट तनाव के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ा है। सबसे ज्यादा प्रभाव टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ा है। कच्चे माल, केमिकल्स, यार्न और कोयले की कमी और उनकी कीमतों में वृद्धि से टेक्सटाइल उद्योग का बुरा हाल बना हुआ है। सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में उत्पादन लागत में 10-20 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिससे व्यापारी माल कम खरीद रहे हैं और मिलों में काम कम हो रहा है। सूरत से बड़ी मात्रा में कपड़े दुबई समेत 45 देशों में जाते हैं। इस युद्ध का असर सूरत के कपड़ा बाजार पर भी पड़ है। सूरत टेक्सटाइल मार्केट से दुबई के रास्ते 45 देशों के साथ व्यापार किया जाता रहा है। पर अब सीधा असर सूरत शहर के टेक्सटाइल उद्योग पर पडऩे लगा है। वैसे तो केंद्र सरकार टेक्सटाइल उद्योग को ढर्रे पर लाने के लिए निरंतरत प्रयासरत है, कई पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स पर कस्टम ड्यूटी 30 जून 2026 तक हटा दी है, जो लागत को कुछ कम कर सकती है। पर पूरी तरह से रिकवरी के लिए समुद्री रास्ते का सामान्य होना जरूरी है। युद्ध के कारण निर्यात पर भी असर पड़ा है, जिससे उद्योग की आय कम हुई है। सूरत जैसे प्रमुख केंद्र भी इससे प्रभावित हुए हैं। मिलें बंद होने की कगार पर हैं। इस क्षेत्र से होने वाले निर्यात के ऑर्डर भी अधर में लटके हुए हैं। हूती विद्रोहियों के डर से शिपिंग रूट बदलने के कारण माल ढुलाई का किराया 10 गुना तक बढ़ गया है।कोयला और गैस की किल्लत से टेक्सटाइल मिलों में कामकाज के दिन घटाने पड़ रहे हैं, जिससे उत्पादन ठप हो रहा है। सूरत, नवसारी और पलसाना जैसे प्रमुख केंद्रों में श्रमिकों का पलायन बढ़ रहा है। ऐसे में सरकार को टेक्सटाइल उद्योग के बचाव के लिए और अधिक पहल करना बहुत जरूरी है।

