गरीबी केवल खाली जेब का नाम नहीं है, बल्कि यह भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, असुरक्षित आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का सम्मिलित रूप है। किसी भी देश का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचे। इसी उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। यह दिवस हमें गरीबी को केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और अधिकारों से जुड़ा प्रश्न मानने की प्रेरणा देता है। इस दिवस का इतिहास वर्ष 1987 से जुड़ा है, जब फ्रांस की राजधानी पेरिस के ट्रोकाडेरो में एक लाख से अधिक लोग अत्यधिक गरीबी, भूख और हिंसा के शिकार लोगों की स्मृति में एकत्र हुए थे। उन्होंने गरीबी को मानवाधिकारों के उल्लंघन के रूप में रेखांकित किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसंबर 1992 को प्रस्ताव 47/196 के माध्यम से 17 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया। इसका उद्देश्य जनजागरूकता बढ़ाना, गरीबों की आवाज को मंच देना और गरीबी के विरुद्ध सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। संयुक्त राष्ट्र भारत में गरीबी कम करने के लिए सरकार विभिन्न योजनाएँ चला रही है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराती है। प्रधानमंत्री आवास योजना गरीबों को पक्के मकान उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना खाद्यान्न सुरक्षा में सहायक हैं। दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार और आय बढ़ाने के अवसर देता है। कौशल विकास, स्वास्थ्य सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और सामाजिक सहायता से जुड़ी योजनाएँ भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण हैं। भारत सरकार नीति आयोग के एक चर्चा-पत्र के अनुसार, भारत में बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हुआ। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। यह प्रगति उत्साहजनक है, लेकिन इसे गरीबी के पूर्ण उन्मूलन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। नीति आयोग भारत में गरीबी का स्थायी उन्मूलन केवल सरकारी सहायता बाँटने से नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि सुधार, महिला सशक्तीकरण और छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने से होगा। योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचे, भ्रष्टाचार रुके और क्रियान्वयन में पारदर्शिता रहे, यह भी आवश्यक है। साथ ही, जाति, लिंग, क्षेत्र और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले अवसरों के भेदभाव को दूर करना होगा।
अंतत: गरीबी उन्मूलन सरकार के साथ समाज की भी साझा जिम्मेदारी है। जब प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन, समान अवसर और अपनी मेहनत से आगे बढऩे का अवसर मिलेगा, तभी समावेशी विकास का सपना साकार होगा। गरीबी के विरुद्ध वास्तविक विजय वही होगी, जिसमें कोई भी व्यक्ति भूख, बेघरपन और अवसरों की कमी के कारण पीछे न छूटे।

