ईरान-इजरायल युद्ध के कारण भारत के सामने कई चुनौतियां सामने आ रही हैं। इसे दूसरी जगह अपने विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। जहां एक तरफ भारत के कई राज्यों में पिछले दिनों ही गैस की कीमतों में साठ रुपए की बढ़ोतरी कर दी गई है। दरों में बढ़ोतरी के अलावा रसोई गैस की किल्लत भी आमजन को सताने लगी है। काफी समय पहले कराई गई लाखों लोगों की बुकिंग भी स्थगित कर दी गई है। अब लोगों को सबसे बड़ी चुनौती तेल की कीमतों में वृद्धि का सताने लगा है। जहां इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई भी इससे बढ़ जाएगी। भारत अपनी जरूरत का लगभग 40-50 फीसदी कच्चा तेल मध्य एशिया के देशों से आयात करता है। अगर युद्ध लंबा चलता है तो आयात प्रभावित हो सकता है। युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। युद्ध के कारण हवाई सेवा प्रभावित हो सकती है, जिससे हवाई यात्रा महंगी हो सकती है। भारत का आधा से अधिक तेल आयात होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से होकर गुजरता है, जिसके बंद होने या प्रभावित होने से तेल की भारी किल्लत हो सकती है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण शिपिंग कंपनियों ने आपातकालीन सरचार्ज लगा दिया है, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है और तैयार माल का निर्यात प्रभावित हो रहा है। कच्चे तेल के अलावा युद्ध के कारण फर्टिलाइजर की आपूर्ति में व्यवधान से भारत में कृषि और खाद्य उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ सकता है। वहीं युद्ध के कारण डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपए की गिरावट हो सकती है। युद्ध के कारण खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है। युद्ध के कारण आर्थिक मंदी की संभावना है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। ऐसे में भारत को भी आगे आकर इन देशों के बीच लंबे खींचने वाले युद्ध में शांति का अग्रदूत बनकर आगे आना चाहिए, ताकि युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चल सके।

