पिछले दिनों देश के जाने-माने उद्योगपति गौतम अडानी पर लगे ताजा आरोपों ने देश और दुनिया में हलचल मचा दी है। अमेरिकी नियामक एजेंसी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमिशन ने अडानी ग्रुप पर भारत में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह करने का आरोप लगाया है। हालांकि अडानी ग्रुप ने इन आरोपों का खंडन किया है। इस ग्रुप से जुड़ा पिछला विवाद अमेरिका के ही एक प्राइवेट एनालिस्ट फर्म हिंडेनबर्ग की रिपोर्ट को लेकर था, जिसमें इस ग्रुप पर अपने शेयरों के भाव गलत ढंग से चढ़ाने का आरोप लगाया गया था। मगर इस बार मामला किसी प्राइवेट पार्टी का नहीं बल्कि अमेरिकी नियामक सिक्यॉरिटीज एंड एक्सचेंज कमिशन का है। अमेरिकी अभियोजकों के मुताबिक अडानी ग्रुप ने भारत में अपने सोलर एनर्जी प्रॉजेक्ट्स के कॉन्ट्रेक्ट्स हासिल करने के लिए अधिकारियों को करीब 2200 करोड़ रुपए की रिश्वत दी और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया। आरोपों की गंभीरता इस बात से भी साबित होती है कि उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ न्यूयॉर्क में गिरफ्तारी वारंट भी जारी हो चुका है। यह बात सही है कि एसईसी की जांच-पड़ताल आखिरकार कहां पहुंचेगी? इस बारे में फिलहाल कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता और यह भी कि एसईसी के साथ विवाद में पडऩे वाली कंपनियों की सूची में सीमेंस, पेट्रोब्रास, हॉलिबर्टन और गोल्डमैन सैक्स जैसे बड़े-बड़े नाम शामिल रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अडानी ग्रुप की आगे की राह आसान साबित होने वाली है। ताजा विवाद का पहला प्रत्यक्ष प्रभाव यह हो सकता है कि अमेरिका में निवेश जुटाना इस ग्रुप के लिए कम से कम आने वाले कुछ समय के लिए खासा मुश्किल हो जाए। अन्य देशों में भी इसके प्रॉजेक्ट्स के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसका पिछले दिनों केन्या से आई वह खबर है, जिसके मुताबिक वहां की सरकार ने एसईसी के आरोपों के बाद अडानी ग्रुप से जुड़ी करीब 2.5 बिलियन डॉलर की डील कैंसल कर दी है। जहां तक भारत के अंदर के सिस्टम और उसके निगरानी तंत्र की बात है तो इस विवाद ने उस पर वाजिब सवाल खड़े किए हैं। लेकिन यहां इस तरह की अनियमितताओं के आरोप नए नहीं हैं। सारे आरोप सही नहीं साबित होते, लेकिन ऐसे तमाम मामलों में एक बात सामान्य रहती है कि कंपनियां या ग्रुप नियम-कानूनों को अपने मुताबिक तोडऩे-मरोडऩे की कोशिश करते हैं और सरकारी अधिकारी व नेता इसमें उनकी पूरी मदद करते हैं। अफसोस की बात यह है कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की कोई उम्मीद अभी भी नजर नहीं आ रही है।

