हमेशा मुस्कुराना जरूरी नहीं होता। कई बार तो पॉजिटिव रहना भी बोझ सा लगने लगता है। लोग अक्सर बोल देते हैं।
> सब ठीक हो जाएगा।
> ‘कम से कम ऐसा तो नहीं हुआ।’
> ‘सोचो, इससे भी बुरा हो सकता था।’
> ‘मुस्कुराओ, सब अच्छा है।’
> ‘भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है।’
> ‘क्या पता आज की परेशानी में कल की कोई भलाई छुपी हो।’
> ‘तुम तो बहुत स्ट्रॉन्ग हो, इतनी सी बात पर क्यों परेशान हो?’
> ‘तुम तो सबका सहारा हो, आज खुद ही टूट गए?’
> ‘भगवान ने तुम्हें बहुत काबिल बनाया है।’
> ‘तुम्हारे पास तो इतने लोग हैं, इतना बड़ा नेटवर्क है, फिर किस बात की चिंता?”
पर क्या हर बार मुस्कुराना सही है? क्या हर दर्द को छुपा लेना चाहिए? जरूरी नहीं कि हर मुस्कान के पीछे सब कुछ ठीक ही हो। कभी-कभी मुस्कान भी बस एक मुखौटा होती है, जिसके पीछे बहुत कुछ छुपा होता है, लेकिन शायद लोग यह भूल जाते हैं कि ऊपर कही गई सारी बातें मात्र एक दिखावा हैं- जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं ‘आई शैडो’।
यह एक ऐसी उलझन है कि जब भी किसी पर कोई मुसीबत आती है, तो लोग या तो साथ छोड़ देते हैं, या फिर साथ देने से कतराते हैं, और कोई न कोई बहाना बना लेते हैं। ऐसे लोगों को पहचानना हमारे लिए बहुत जरूरी है।
आजकल हर किसी को एक ऐसे भरोसेमंद दोस्त या साथी की जरूरत है, जिससे वो अपने दिल की बातें खुलकर कह सके, मुश्किल वक्त में सलाह ले सके, और जिससे उसकी आगे की जिंदगी के फैसले बेहतर हो सकें, लेकिन अफसोस की बात यही है कि आजकल ऐसे लोग मिलना सबसे मुश्किल हो गया है।
आज अगर आप किसी दोस्त को अपनी कमजोरी बता देते हैं, या उससे सलाह लेते हैं, तो हो सकता है कि वही इंसान आगे चलकर आपका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाए, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है।
आजकल लोगों का स्वभाव, ईमानदारी और संवेदनाएं इतनी हल्की हो गई हैं कि लोग छोटी-छोटी बातों पर, कुछ पैसों के लिए या अपने अहंकार को खुश करने के लिए, सालों पुराने रिश्ते और दोस्ती तोडऩे में एक पल भी नहीं लगाते।
अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी से दोस्ती या रिश्ता निभाने के बजाय, अगर आप किसी से कुछ काम कह दें और वो कर दे, तो ठीक है, वरना समझ लीजिए कि उससे दूरी बना लेना ही बेहतर है।
कितनी बार ये वाक्य हमारे कानों में पड़े हैं-दोस्त से, रिश्तेदार से, या कभी खुद से भी।
पहली नजऱ में ये वाक्य सहारा लगते हैं- जैसे डूबते को शब्दों की लकड़ी मिल गई हो, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये शब्द, ये ‘पॉजिटिविटी’, किसी दिन हमारे लिए एक बोझ बन जाएं?
हाँ, पॉजिटिविटी भी टॉक्सिक हो सकती है। अजीब लगता है, लेकिन यह सच है।
हम इंसान हैं। हमारे भीतर दुख, ग़ुस्सा, असंतोष, थकान, भय- ये सब भावनाएं होती हैं। इनका बाहर आना, महसूस किया जाना और रिश्तों में जगह पाना ज़रूरी है, लेकिन जब समाज या हमारे अपने ही हमसे यह अपेक्षा करने लगते हैं कि हम हर हाल में ‘सकारात्मक’ रहें- तब यह उम्मीद एक बोझ बन जाती है। और यही बोझ धीरे-धीरे हमें हमारी सच्ची भावनाओं से काट देता है।
किसी को खो देने पर, दिल टूटने पर, नौकरी छूटने पर, या सिर्फ थक कर बैठने की इच्छा में भी यदि हमें सिर्फ ‘पॉजिटिव रहो’ की सलाह मिलती है- तो यह हमारी टूटन को अस्वीकार करना होता है।
नकारात्मक सोच हावी होने की एक और वजह है-न्यूक्लियर फैमिली।
पति-पत्नी अकेले रहते हैं। बच्चे पैदा किए तो ठीक है, नहीं किए तो भी ठीक है। अगर बच्चे हैं भी, तो वे हॉस्टल में पढ़ रहे होते हैं।
जऱा सी भी तकरार हो जाए, या पत्नी के पास कोई कार्य करने लायक अवसर न हो- वैसे भी आजकल घरों में कुछ ख़ास करने को नहीं बचा है।
जिन घरों में सिर्फ दो कमरों का फ्लैट है, वहां भी यदि महिला काम नहीं कर रही है तो दिन भर सोशल मीडिया और टीवी पर ही समय बितता है। ऐसी स्थिति में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होना स्वाभाविक है। आजकल की इस तकनीक वाली दुनिया की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि पॉजिटिव बातें उतनी जल्दी नहीं फैलतीं, जितनी जल्दी नेगेटिव बातें हर जगह पहुँच जाती हैं और फिर वही बातें हमारे दिमाग और दिल पर हावी हो जाती हैं।
‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ असल में वही है, जब किसी की असली परेशानी, दर्द या कमजोरी को इस तरह की बातों से दबाने की कोशिश की जाती है।
> ‘तुम्हें तो खुश रहना चाहिए।’
> ‘इसमें भी कुछ अच्छा देखो।’
> ‘कम से कम तुम ज़िंदा तो हो।”
सोचिए, जैसे किसी गहरे जख्म पर बस फूल चिपका दिए जाएँ। बाहर से तो अच्छा लगेगा, लेकिन अंदर का दर्द तो वहीं रहेगा।
रिश्तों में यह और भी खतरनाक हो जाता है। जब कोई अपना टूट रहा हो, और हम उसे उसकी फीलिंग्स को जीने देने के बजाय सिर्फ पॉजिटिव सोचने की सलाह देते हैं- तब वो इंसान खुद को और अकेला महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उसका दुख मान्य नहीं है, या वो खुद ही कमजोर है।
कई बार तो हम खुद भी अपने अंदर ये टॉक्सिक पॉजिटिविटी पाल लेते हैं। खुद से कहते हैं।
> “रोना नहीं है।”
> ‘मजबूत बनो।’
> ‘मैं फील नहीं कर सकता।’
> ‘जो हो गया, सो हो गया।’
लेकिन सच तो ये है कि दिल रोना चाहता है, मन टूटना चाहता है, शरीर थक जाता है।
क्या होगा अगर हम कुछ देर के लिए सच में वैसे ही हो जाएँ जैसे हैं? अगर अपने आँसू बहने दें? अगर किसी अपने से कह दें- “आज मैं टूट गया हूँ,” और वो बस हमें गले लगा ले, बिना कोई सलाह दिए?
रिश्तों की असली गहराई वहीं से शुरू होती है- जब हम एक-दूसरे को सुनते हैं, महसूस करते हैं, और ये इजाजत देते हैं कि “आज तुम कमजोर हो सकते हो।’
हम ये क्यों भूल जाते हैं कि रौशनी की अहमियत तभी है जब हम अंधेरे को भी जगह दें?
पॉजिटिव सोचना अच्छी बात है, लेकिन जब ये हमारी असली फीलिंग्स, थकान और सच को दबा देती है- तब ये बस एक नकाब बन जाती है। एक ऐसा मुखौटा, जिसे उतारते-उतारते लोग थक जाते हैं।
हमें अपने अपनों, बच्चों और दोस्तों को ये बताना जरूरी है कि जिंदगी में सब कुछ हमेशा ‘ठीक’ होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी ‘ठीक नहीं होना’ भी ठीक ही होता है।
तो अगली बार जब कोई अपने दुख के साथ आपके पास आए तो बस चुपचाप बैठिए, उसका हाथ थामिए और कहिए-‘मैं सुन रहा हूँ। रो लो। मैं यहाँ हूँ।”
सुनील दत्त गोयल
महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, पूर्व उपाध्यक्ष, जयपुर

