रूस और यूक्रेन के बीच बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में पिछले दिनों थोड़ी तेजी देखी गई। क्रूड ऑयल की कीमतों में हल्की तेजी ने भारत को चिंता में डाल दिया है। इसका सीधा असर भारत के इम्पोर्ट बिल पर पड़ेगा। खासतौर से तब जब अप्रैल-अक्टूबर के बीच भारत का कुल ऑयल और गैस इम्पोर्ट बिल 15 फीसदी उछला है। हालांकि, नजर दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश चीन पर है। चीन में ईंधन की मांग को लेकर चिंता के चलते कीमतों पर लगाम लगी है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की अधिक सप्लाई के अनुमानों ने भी बाजार पर दबाव डाल रखा है। वहीं बाइडेन की ओर से यूक्रेन को लंबी दूरी की मिसाइलों से कुर्सक के आसपास रूसी सेना पर हमला करने की अनुमति देने से फिर से तेल कीमतों में तेजी आने के आसार हैं। रूस में कम से कम तीन रिफाइनरियों को निर्यात प्रतिबंधों, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ऊंची उधारी लागत के बीच भारी नुकसान के कारण प्रोसेसिंग रोकनी पड़ी है या फिर कटौती करनी पड़ी है। चीन के कमजोर आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के यह अनुमान लगाए जाने के बाद कि वर्ष, 2025 में वैश्विक तेल सप्लाई मांग से प्रति दिन 10 लाख बैरल से अधिक हो जाएगी, भले ही ओपेक प्लस से कटौती जारी रहे, ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई पिछले सप्ताह 3 फीसदी से अधिक गिर गए थे। हालांकि रूस-यूक्रेन की जंग में तेजी आने से तेल की कीमतों ने दोबारा मजबूत होने के संकेत दिए हैं। क्रूड पर निर्भरता के कारण भारत के लिए इसकी कीमतों में तेजी आना हमेशा खराब ही रहता है। जहां एक ओर भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। वह अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक तेल आयात करता है। प्राकृतिक गैस का भी भारत एक बड़ा उपभोक्ता है। अपनी आधी से अधिक मांग को पूरा करने के लिए वह आयात पर निर्भर है। भारत के कुल व्यापारिक आयात बिल में तेल और गैस का आयात सबसे बड़ा हिस्सा है। भारत का तेल और गैस आयात बिल इस वित्तीय वर्ष के पहले सात महीनों में लगभग 15 फीसदी बढ़ गया है। तेल मंत्रालय के अनुसार अप्रैल-अक्टूबर के दौरान भारत का शुद्ध तेल और गैस आयात मूल्य के हिसाब से 79.3 अरब डॉलर रहा, जो एक साल पहले 69.2 अरब डॉलर था। आयात बिल में बढ़ोतरी का मुख्य कारण कच्चे तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात में बढ़ोतरी है। घरेलू उत्पादन में कमी और मांग में ग्रोथ के चलते आयात बढ़ा है।

