शक्ति, साधना और सकारात्मकता का महापर्व शारदीय नवरात्रि आज से प्रारंभ हो रहे हैं। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाले इस नौ दिवसीय पर्व का समापन 19 अक्टूबर को होगा, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। नवरात्रि केवल देवी दुर्गा की उपासना का अवसर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपी शक्ति को पहचानने और जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लेने का पर्व भी है। भारतीय संस्कृति में मां दुर्गा शक्ति, साहस, करुणा और धर्म की प्रतीक हैं। नवरात्रि का पर्व मात्र रीति-रिवाजों का निर्वाह नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और चेतना के समन्वय का प्रतीक है। वर्ष में दो बार आने वाली मुख्य नवरात्रियों में शारदीय नवरात्रि का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है, क्योंकि यह ऋतु परिवर्तन का काल होता है। इस संधि काल में हमारे शरीर और मन की रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा ऊर्जा स्तर पर प्रभाव पड़ता है। मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों—शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक की आराधना हमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन की हर बाधा या आंतरिक विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह रूपी असुरों का नाश करने के लिए आत्मबल और सद्विचार रूपी शक्ति को जाग्रत करना अनिवार्य है। इस पर्व का वास्तविक महत्व केवल व्रत रखने, पूजा-पाठ करने, गरबा खेलने या मंदिरों में दर्शन करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य मन, वचन और कर्म की शुद्धि भी है। नौ दिन की साधना हमें संयम, अनुशासन, धैर्य और आत्मनियंत्रण का अभ्यास कराती है। मां के विभिन्न स्वरूप नारी शक्ति के सम्मान, निर्भीकता, ज्ञान, ममता और संकल्पशीलता की प्रेरणा देते हैं। इसलिए नवरात्रि हमें यह भी सिखाती है कि बेटियों का सम्मान, महिलाओं की सुरक्षा और समाज में समान अवसर सुनिश्चित करना देवी की आराधना के व्यावहारिक रूप हैं। आज जब समाज हिंसा, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, पर्यावरण प्रदूषण और सामाजिक वैमनस्य जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब नवरात्रि की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इस नवरात्रि आमजन को कुछ छोटे, लेकिन प्रभावी संकल्प लेने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति नशे और व्यसनों से दूर रहने, जल एवं बिजली बचाने, स्वच्छता अपनाने, जरूरतमंदों की सहायता करने और महिलाओं के सम्मान की रक्षा करने का संकल्प ले।

