Thursday, March 12, 2026 |
Home » सरकार की अनदेखी से तेल मिलें बंद होने के कगार पर

सरकार की अनदेखी से तेल मिलें बंद होने के कगार पर

by Business Remedies
0 comments

ब्रांडिंग और मार्केटिंग के दम पर थर्ड पार्टी तेल कंपनियां जमकर कमा रही मुनाफा, मार्केटिंग के अभाव में असली तेल उत्पादक खो रहे पहचान

कुंजेश कुमार पतसारिया

बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। सरकार की अनदेखी और नीतियों  के कारण आज खाद्य तेल उत्पादकों को काफी परेशानियों को सामना करना पड़ रहा है। आधी से ज्यादा तेल मिलें बंद होने के कगार पर हैं। वैसे तो बड़ी-बड़ी मॉल्स पर ब्रांडेड तेल कंपनियों का टेक लगाकर कारोबारी काफी मुनाफा कमा रहे हैं। कोरोना महामारी के बाद से तो खाने के तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। आज तेल इकाइयों और थर्ड पार्टी तेल कंपनियों के बीच चल रही जंग के कारण शुद्धता को ताक में रख दिया है। वहीं बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए खाद्य तेल के आयात पर भारत की निर्भरता चिंता का विषय बनी हुई है। जहां एक ओर उत्पादन और खपत के बीच का अंतर कम करने के लिए सरकार किसानों को तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है। वहीं देश में खाद्य तेलों की कीमतों को बढऩे से रोकने के लिए केंद्र सरकार ने इन पर लागू घटी हुई आयात शुल्क व्यवस्था को मार्च, 2025 तक बढ़ा रखा है।

थर्ड पार्टी तेल कंपनियां जमकर कूट रही हैं माल: जहां एक ओर राजस्थान में केवल ब्रांडिंग और मार्केटिंग के दम पर थर्ड पार्टी तेल कंपनियां जमकर माल कूट रही हैं। आज स्थानीय तेल मिलें अपने ब्रांड की पहचान खो चुकी हैं और थर्ड पार्टी कंपनियों की मैन्युफैक्चरर और सप्लायर बनकर रह गई हैं। बड़े-बड़े मॉल्स पर ब्रांडेड कंपनियां तेल उत्पादकों से खाद्य तेल लेकर उन्हें महंगे दामों में बेच देती है, इससे तेल उत्पादकों को नुकसान भुगतना पड़ता है। शुद्धता की जिम्मेदारी भी जहां तेल मिल मालिकों की ही होती है, अगर कोई फूड सेफ्टी एक्ट के तहत कार्रवाई की जाती है, तो मैन्युफैक्चरर को ही भुगतना पड़ता है।

350 से ज्यादा है तेल की इकाइयां: आज राजस्थान में 350 से ज्यादा तेल की मध्यम और बड़ी इकाइयां हैं, जिनमें से कुछ पतंजलि, सोना सिक्का व अन्य ब्रांड्स के लिए तेल बनाती हैं। हालांकि पतंजलि ने जबसे रुचि सोया का टेकओवर किया है, तब से वह खुद ही मैन्यूफैक्चरिंग कर रही हैं। लेकिन इसके बावजूद प्रदेश में दर्जनों थर्ड पार्टी ब्रांड हैं, जो स्थानीय तेल मिलों से टाइअप कर अपना ठप्पा लगाकर माल बेच रहे हैं।

मैन्युफैक्चर्ड और मार्केटिंग बाय का झमेला: थर्ड पार्टी कंपनियां पैकिंग पर केवल अपनी फर्म के आगे ‘मार्केटिंग बाय’ ही लिखती हैं। वहीं जिस तेल मिल से ये माल बनवा रही हैं, उसे फर्म का नाम ‘मैन्युफैक्चर्ड बाय’ के सेक्शन में लिखती है। एग्रीमेंट में भी शुद्धता से लेकर कोई भी मिलावटी कार्रवाई तक की जिम्मेदारी मैन्युफैक्चरर की होती है। इतना ही नहीं इन ब्रांडेड कंपनियों का मूंगफली का तेल निर्माण इकाइयों के तेल की तुलना में 200 से 300 रुपए प्रति टिन महंगा होता है। वर्तमान में ब्रांडेड मूंगफली तेल 2550 से 2650 रुपए प्रति टिन तक है, जबकि उसी मिल का तेल 2350 से 2400 रुपए प्रति टिन में उपलब्ध है।

एमआरपी का गंदा खेल: मार्केट में बिकने वाले घी-तेल के पैकेट पर दर्ज एमआरपी की आड़ में दुकानदारों की बल्ले-बल्ले हो रही है। खाद्य तेलों पर महंगाई की जबरदस्त मार है। महंगाई से आम ग्राहकों का बजट गड़बड़ा गया है। एमआरपी की आड़ में आम लोगों के साथ गंदा खेल खेला जाता है। मान लीजिए 1 लीटर मूंगफली, सरसों, सोयाबीन तेल का एमआरपी 160 से 250 और 15 किलो टीन की एमआरपी 3000-3200 है। थोक विक्रेता 160 रुपए पैकेट में बेचता है और 15 किलो का टीन 2600 में बिकता है। जबकि खुदरा दुकानदार एमआरपी से पैकेट का मनमाना 180 रुपए तक वसूलता है। अब आपके सामने दुकानदार दावा करते हुए मिल जाएगा कि एमआरपी से कम में बेच रहे हैं। कई दुकानदार एमआरपी के अनुसार कीमत वसूल कर मुनाफाखोरी करता है।

तेल-घी के प्रिंट पर केंद्र सरकार का नियंत्रण नहीं: प्रिंट छपने के बाद बदला नहीं जा सकता है। 20 साल पहले एमआरपी के प्रिंट पर केंद्र सरकार का कंट्रोल था। अब नहीं होने से दुकानदार फायदा उठाकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं। तेल का दाम बढऩे पर कोई भी अधिकारी कार्रवाई नहीं कर रहा है। बाजार में कई दर्जन घी और तेल के ब्रांड मौजूद हैं। सभी ब्रांड की अलग-अलग पैकिंग होने के साथ अलग-अलग एमआरपी भी है। कंपनियां ही 1 लीटर पर 50 से 100 रुपए ज्यादा एमआरपी का प्रिंट दर्ज कर प्रोडक्ट को बाजार में भेजती हैं और दुकानदार फायदा उठाते हैं। दाम कंट्रोल नहीं होने के चलते आम लोगों को महंगाई का सामना करना होता है।

सरकार तेल उत्पादकों का कोई ध्यान नहीं दे रही है। इस कारण कई तेल मिलें बंद होने के कगार पर है। निवाई में ही २५ तेल मिलें है, लेकिन उनके घाटे में जाने के कारण उत्पादन ना के बराबर रहे गया है। सरकार जो तेल कीमतों के आंकड़े ले रही है वह बड़े-बड़े मॉल्र्स के ले रही है। जबकि सच्चाई यह है कि तेल उत्पादकों का सप्लाई किया माल ही बड़े-बड़े मॉल्स में काफी ऊंची कीमतों में बिक्री की जाती है। वहीं सरकार ने गलत आंकड़े लेकर तेलों की ऊंची कीमतों के कारण आयात शुल्क को शून्य कर दिया है, इससे तेल उत्पादकों को परेशानी उठानी पड़ रही है।

-पारस कुमार जैन, निदेशक, श्री बालाजी इंडस्ट्रीज औद्योगिक क्षेत्र,निवाई और अध्यक्ष, ऑयल मिल एसोसिएशन, निवाई

भरतपुर में अधिकांश तेल मिलें बंद पड़ी है, जो चल रही है वे भी घाटे में ही है। यहां करीब १५० से ज्यादा तेल मिलें है। तेल उत्पादकों को कॉस्टिंग ज्यादा आने और भाव कम मिलने के कारण काफी दिक्कतें आ रही है। जब बाजार बढ़ता है, तो व्यापार होता है और व्यापार नहीं चल रहा तो भाव भी नीचे हो जाते है, माल बिकने में नहीं आता है। ऐसे में सरकार की नीतियां भी काफी हद तक तेल उद्योग को पीछे करने में भागीदार है।

-मनु अग्रवाल, डायरेक्टर, हरि इंडस्ट्री, भरतपुर

निवाई में करीब 24 तेल मिलें है,लेकिन सरकार की नीतियों के कारण बंद होने के कगार पर है। पिछले दो साल से तो तेल उत्पादकों की हालत बहुत खराब हो रही है। 24 घंटे में से केवल 8 घंटे बेमुश्किल से काम हो पा रहा है।

-अजय कटारिया, निदेशक, स्वास्तिक प्रोडेक्टस, निवाई

सरसों मार्केट में जिस भाव में खरीद रहे हैं, तेल मिलर्स उस भाव का पड़ता लगाए तो करीब एक सौ रुपए क्विंटल का नुकसान तेल मिलर्स को उठाना पड़ रहा है। निवाई में 80 फीसदी तेल मिलें या तो बंद हैं या फिर बंद होने के कगार पर हैं। बाहर से आ रहे हल्के तेलों किनोला, पॉम तेलों पर सरकार प्रतिबंध लगाए। आज सरकार की अनदेखी व नीतियों के कारण ही हम तेल उत्पादकों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। राजस्थान में अधिकांश तेल मिलें बंद हो रही है।

-राहुल बोहरा, पार्टनर, कैलाश उद्योग, निवाई



You may also like

Leave a Comment