Sunday, June 14, 2026 |
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पांडुलिपियाँ भारत की अतुलनीय सभ्यतागत धरोहर, इस पर पांच दिवसीय पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन में मंथन शुरू

पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन में ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला

by Business Remedies
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-पांच दिनों तक Patanjali Research Foundation में ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ विषय पर मंथन

-पांडुलिपियाँ मानव गतिविधियों का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती हैं : ज्ञान भारतम् मिशन

-प्राचीन ग्रंथों में सृष्टि एवं ज्ञान परंपरा का अमूल्य संकलन निहित : National Archives of India

Haridwar | बिजनेस रेमेडीज | भारत सरकार के Ministry of Culture (MoC) की प्रमुख पहल ‘ज्ञानभारतम् मिशन’ के अंतर्गत ‘पांडुलिपियों का निवारण एवं संरक्षण’ विषय पर पाँच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन Patanjali Research Foundation, Haridwar में किया जा रहा है। इस मिशन का उद्देश्य भारत की विशाल एवं अमूल्य पांडुलिपि विरासत का संरक्षण, दस्तावेजीकरण तथा डिजिटलीकरण करना है, ताकि यह प्राचीन ज्ञान-संपदा भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

कार्यशाला का आयोजन पांडुलिपि संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने तथा संरक्षण एवं भंडारण संबंधी कौशल विकसित करने के उद्देश्य से किया गया। कार्यक्रम में Ministry of Culture के अधिकारियों, विशेषज्ञों तथा विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का शुभारंभ यज्ञ एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। अतिथियों का स्वागत शॉल, माला एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर किया गया। स्वागत उद्बोधन Patanjali Research Foundation की अनुसंधान प्रमुख Dr. Vedpriya Arya ने दिया।

Patanjali Research Foundation के उपाध्यक्ष Dr. Anupam Shrivastava ने ‘Flora’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह किसी विशेष क्षेत्र अथवा कालखंड में पाए जाने वाले पौधों का व्यवस्थित वैज्ञानिक विवरण होता है, जो पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का वैज्ञानिक दस्तावेज जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत के National Archives of India के उप निदेशक Dr. Ram Swaroop Kisan ने कहा कि पांडुलिपियाँ हस्तलिखित अभिलेख हैं, जो मानव गतिविधियों एवं ऐतिहासिक घटनाओं के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। इनमें विविध लिपियाँ, भाषाएँ, विषय-वस्तु, कलात्मक संरचनाएँ, अलंकरण एवं चित्रांकन पाए जाते हैं। पांडुलिपियाँ ताड़पत्र, भोजपत्र, ताम्रपत्र, सुवर्णपत्र तथा पत्थर पर लेखन जैसी विभिन्न स्वरूपों में उपलब्ध हैं।

उन्होंने बताया कि भारत एवं विश्व के अनेक संग्रहालयों तथा पुस्तकालयों में ताड़ एवं भोजपत्रों पर अंकित सैकड़ों वर्ष पुरानी पांडुलिपियाँ संरक्षित हैं। वर्तमान समय में यह अमूल्य धरोहर अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, इसलिए ‘राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन’ संस्थागत एवं निजी संग्रहों में सुरक्षित पांडुलिपियों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सतत कार्य कर रहा है।

उन्होंने आगे बताया कि पांडुलिपियों के संरक्षण हेतु रासायनिक एवं पारंपरिक दोनों उपाय अपनाए जाते हैं। इन्हें नमी, धूल, धूप एवं कीटों से बचाने के लिए Acid-Free बक्सों में सुरक्षित रखा जाता है तथा तापमान एवं आर्द्रता का संतुलन बनाए रखा जाता है। आग, बाढ़ एवं भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा हेतु विशेष भंडारण एवं बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।

‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के परियोजना निदेशक Prof. Anirban Das ने कहा कि भाषा, लिपि एवं विषय-वस्तु-इन तीनों आयामों के संरक्षण एवं संवर्धन पर गंभीरता से कार्य किया जा रहा है। अब तक लगभग 75 लाख पांडुलिपियों का पंजीकरण किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि मिशन के अंतर्गत भाषा-विज्ञान, सर्वेक्षण, अनुसंधान एवं प्रकाशन, डिजिटलीकरण तथा स्वरूप-विश्लेषण जैसे पाँच प्रमुख क्षेत्रों में कार्य किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री पांडुलिपियों को भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा, संस्कृति एवं सभ्यता की अमूल्य धरोहर मानते हैं। उनके अनुसार ये केवल प्राचीन दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि एवं दार्शनिक विरासत के जीवंत प्रमाण हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि लगभग 200 पांडुलिपियों को Artificial Intelligence (AI) तकनीक से सहसंबद्ध किया गया है।

Archaeological Survey of India (ASI) से जुड़े Chand Mohan Joshi ने ‘अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ का उल्लेख करते हुए बताया कि यह महायान बौद्ध धर्म का अत्यंत प्राचीन एवं महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसका अर्थ ‘आठ हजार पंक्तियों में ज्ञान की पूर्णता’ है। यह ग्रंथ बोधिसत्व मार्ग, शून्यता एवं निर्वाण की अवधारणा को स्पष्ट करता है तथा इसे ‘बुद्धमाता’ भी कहा जाता है।

उन्होंने कहा कि भारत सरकार प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण एवं डिजिटलीकरण हेतु ‘ज्ञानभारतम् मिशन’ संचालित कर रही है। अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में ताड़पत्र, भूर्जपत्र, ताम्रपत्र, कपड़ा एवं चमड़े जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग पांडुलिपियों के लेखन एवं संरक्षण में किया जाता था।

इतिहास एवं पुरातात्विक अनुसंधान प्रभाग की प्रमुख वैज्ञानिक Dr. Rashmi Mittal ने बताया कि इथियोपियाई पांडुलिपियाँ मुख्यतः Ge’ez भाषा में चर्मपत्र पर लिखी गई धार्मिक एवं सांस्कृतिक कृतियाँ हैं, जो 14वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य की हैं। इनमें उत्कृष्ट चित्रांकन देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि ‘Garima Gospel’ चौथी से छठी शताब्दी की एक अत्यंत प्राचीन सचित्र पांडुलिपि है।

उन्होंने सुश्रुत संहिता का उल्लेख करते हुए बताया कि इसकी सबसे प्राचीन प्रति Nepal के Kaiser Library में संरक्षित 878 ईस्वी की ताड़पत्र पांडुलिपि है, जिसमें शल्य चिकित्सा का विस्तृत विवरण मिलता है। साथ ही उन्होंने Hastinapur को महाभारत कालीन कुरु साम्राज्य की राजधानी एवं पांडव-कौरवों की जन्मभूमि बताया।

INTACH Conservation Institute, Lucknow की पूर्व निदेशक एवं कला संरक्षक Dr. Mamta Mishra ने कहा कि पारंपरिक विरासत का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक पहचान, इतिहास एवं मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्राचीन स्मारकों के संरक्षण में पारंपरिक सामग्रियों एवं कौशल का आधुनिक तकनीक के साथ समन्वित उपयोग किया जाना चाहिए।

Dr. Vedpriya Arya ने ‘धरोहर, संस्कृति एवं संरक्षण’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ये ऐसे तत्व हैं, जो किसी समाज की पहचान, इतिहास एवं भविष्य को परस्पर जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि Patanjali अपने विज़न एवं मिशन के साथ सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में निरंतर अग्रसर है।

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए Dr. Anupam Shrivastava ने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ नवीन ज्ञान एवं शोध दृष्टि प्रदान करती हैं। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों ने Patanjali Herbal Garden एवं अनुसंधान केंद्र का भ्रमण कर उसके प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम का समापन अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हुआ।



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